Wednesday, December 23, 2009

मूंछ उखाड़े मुर्दा हल्को न होवे

3विचार आए
मूंछ उखाड़े मुर्दा हल्को होवे

===============

इस कहावत का अर्थ इस रूप में लगाया जा सकता है कि छोटे-छोटे काम निपटाने से किसी बड़े काम में सफलता नहीं मिलती। बड़े काम को करने में इस तरह के छोटे-छोटे प्रयासों से मदद भी नहीं मिलती। इस तरह के छोटे काम निरर्थक ही कहे जा सकते हैं।

Thursday, December 17, 2009

घर में नईंयाँ दाने, अम्मा चली भुनाने

4विचार आए

घर में नईंयाँ दाने,
अम्मा चली भुनाने।

---------------------
नईंयाँ - नहीं हैं
---------------------
यह कहावत ऐसे लोगों पर सटीक सिद्ध बैठती है जो स्वयं में कुछ न होने के बाद भी अपने आप में बहुत कुछ होने का दम भरते हैं। इसे दूसरे रूप में ऐसे भी देखा जा सकता है कि व्यक्ति कैसे झूठी शान दिखाता घूमता है।

Monday, December 7, 2009

5विचार आए
छाया बखत की चाहे कैर ही हो,
चलना रास्ते का चाहे फेर ही हो,
बैठना भाइयों में चाहे बैर ही हो

Friday, November 6, 2009

ओछे की प्रीत, बालू की भीत

7विचार आए
ओछे की प्रीत,

बालू की भीत


-----------------
ओछे - गिरा हुआ
भीत - दीवार

------------------
भावार्थ - इसका अर्थ इस रूप में लगाया जा सकता है कि जैसे बालू की दीवार मजबूत नहीं होती, कभी भी गिर सकती है उसी तरह किसी भी रूप से गिरे हुए व्यक्ति की दोस्ती भी अधिक दिनों तक नहीं चलती है
व्यक्ति चरित्र, जुबान, विश्वास आदि किसी से भी गिरा हुआ हो सकता है

Saturday, October 31, 2009

काठ की हंडी बार बार नहीं चढ़ती .

1 विचार आए
काठ की हंडी बार बार नहीं चढ़ती .
इसका मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को बार - बार मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है सिर्फ एक बार बनाया जा सकता है . जैसे काठ की हांडी चुलेह पर सिर्फ एक बार चढ़ती है बार - बार नहीं वैसे ही किसी को एक बार मूर्ख बनाया जा सकता है. .

Tuesday, October 27, 2009

सो वो कानईं मे मूत्हे

3विचार आए
लला को सिर पै बैठाहो,
सो वो कानईं में मूतहै।

-------------
कानईं - कान में
बैठाहो - बैठाओगे
मूतहै - पेशाब करना
लला - लड़कों को देशज भाषा में बुलाने का शब्द
------------------
भावार्थ - इसे कहावत के स्थान पर लोकोक्ति कहना ज्यादा उचित है। यह बुन्देलखण्ड में बहुत ही ज्यादा प्रचलन में है। इसका अर्थ यह लगाया जाता है कि किसी भी व्यक्ति या बच्चे को अधिक लाड-प्यार दीजिए तो वह बिगड़ैल होकर परेशान करने वालीं हरकतें करने लगता है।

Wednesday, October 7, 2009

एक कहावत

2विचार आए
नौ सो चूहे खा कर बिल्ली हज को चली
यानि सौ गुनाह कर के कोई जब मंदिर जाता है अपना पाप धोने तब यह कहावत याद आती है...

Tuesday, September 29, 2009

एक कहावत पुरानी

4विचार आए
पूत कपूत तो का धन संचय , पूत सपूत तो का धन संचय
इस कहावत के पीछे का मर्म यह है कि पूत अगर कपूत निकला तो उसके लिए धन संचय करके क्या फायदा , क्यों कि कपूत तो कमाया हुआ धन नष्ट कर देगा. और अगर वो सपूत निकला तो भी धन संचय कर के क्या फायदा , क्योकि सपूत खुद धन संचय कर सकता है. दोनों ही हालातो में मनुष्य को संग्रह कि नीति से बचना का सुझाव दिया गया है.

Saturday, September 26, 2009

एक कहावत

1 विचार आए
बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद

यानि गलत पात्र से (बन्दर से ) किसी सही चीज (अदरक ) का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए .
जैसे किसी डाक्टर से किसी कानून की बरीकियो के बारे में राय लेना .

एक कहावत

2विचार आए
दान के बछ्छिया के दांत नहीं गिने जाते

यानि जो चीज मुफ्त में मिल रही है उसमे मीन मेख नहीं निकला जाता है. जैसा मिलरहा है वैसा स्वीकार किया जाता है.

Thursday, September 24, 2009

कौआ कोसे ढोर न मरे

3विचार आए

कौआ के कोसे ढोर मरे तो,
रोज कोसे, रोज मारे, रोज खाए।

----------------------------------

कोस - किसी के बारे में बुरा सोचना, किसी का बुरा होने की कामना करना।
ढोर - जानवर

-----------------------------
भावार्थ - इसका सीधा सा अर्थ है कि यदि बुरा सोचने वालों के कारण ही किसी का बुरा होने लगे तो सभी बैठे-बैठे लोगों का बुरा करते रहेंगे। यदि ऐसा होता तो कौआ को अपने खाने के लिए किसी मरे जानवर का इंतज़ार नहीं करना पढता। वह रोज किसी जानवर का बुरा सोचता (मरने की सोचता) जानवर मरते और कौआ को खाने को मिलता।
इससे शिक्षा मिलती है कि हमारा बुरा हमेशा हमारे कर्मों से होता है, किसी के बुरा चाहने से हमारा बुरा नहीं होता।

Monday, September 7, 2009

5विचार आए
हड़बड़ी बियाह , कनपटी सिनूर
यह मैथिलि कहावत मेरे एक मित्र रजनीश झा ने मेरे ब्लॉग बकबक पर प्रतिक्रिया स्वरुप डाला था मै आप के सामने पेश कर रही हूँ .

हड़बड़ी का काम शैतान का होता है. जल्दीबाजी में शादी करने गए थे तो दुल्हे ने दुल्हन के कान में सिन्दूर डाल दिया .

Sunday, September 6, 2009

गाडी देख पग भारी

5विचार आए
"गाडी देख,पग भारी"

कोई भी सुविधा (जो पहले नहीं थी,तब भी काम चल रहा था) जब उपलब्ध होने की सम्भावना होती है तो ऎसा महसूस होने लगता है कि उसके बिना हमारा काम चल ही नहीं सकता। जैसे पैदल चलने वाले को गाडी में बैठने का अवसर मिलते ही उसे अपने पैर पैदल चलने में भारी भारी से महसूस होने लगते हैं।

Tuesday, September 1, 2009

एक कहावत

3विचार आए
सारा खीर खा के पेंदा तीता करना

इस कहावत का मतलब होता है कि सारा काम निपटा कर अंत में ऐसा कुछ कर देना या कह देना जिससे पहले किया गए काम का सारा मजा किरकिरा हो जाये .
तीता- कड़वा , पेंदा - किसी भी चीज का अंतिम सिरा

Monday, August 31, 2009

एक कहावत बिहार की

2विचार आए
खिसियानी बिल्लैअ , खंभा नोचे .
ये कहावत तब बोली जाती है जब कोई व्यक्ति कुछ करना चाहता है पर वो काम नहीं कर पता तो हताशा में उस काम या उससे जुड़े व्यक्ति के बारे में गलत - सही बोलना शुरु कर देता है. क्यों कि उस काम या व्यक्ति का कुछ नहीं बिगड़ता है" बिल्ली " सिर्फ खब नोच कर ही रह जाती है.

Friday, August 28, 2009

बछ्वा बैल बहुरिया जोय, ना हर बहे ना खेती होय---एक भोजपुरी कहावत्

4विचार आए
किसी भी समाज की लोकसंस्कृ्ति को यदि जानना हो तो उसके लिए उस समाज में प्रचलित कहावतों से बढकर अन्य कोई श्रेष्ठ माध्यम हो ही नहीं सकता। क्यों कि इनमें उस समाज के पूर्वजों द्वारा संचित किया गया सदियों का अनुभव एवं इतिहास समाहित होता है। यदि ये कहा जाए कि कहावतें लोक जीवन की चेतना हैं तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। श्री सिद्धार्थ जोशी जी ने जो इस कम्यूनिटी ब्लाग के जरिये अपनी लोक संस्कृ्ति से परिचय कराने का एक प्रयास आरंभ किया है,उसके लिए यें साधुवाद के पात्र हैं। आज इस ब्लाग की सदस्यता के रूप में उन्होने जब मुझे भी इस पथ का अनुगामी बनने को आमंत्रित किया तो उसे अस्वीकार करने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था।
चलिए आज अपनी इस भूमिका का श्रीगणेश करते हुए आपका परिचय एक भोजपुरी कहावत से कराया जाए।

बछ्वा बैल बहुरिया* जोय, ना हर* बहे ना खेती होय।
इस कहावत के माध्यम से यह बताया गया है कि किसी भी महत्वपूर्ण कार्य को करने के लिए सदैव क्षमतावान व्यक्ति का ही चुनाव करना चाहिए। यदि किसी अक्षम व्यक्ति को उस कार्य की जिम्मेदारी सौंप दी जाए तो न तो वो कार्य ठीक से सम्पूर्ण हो पायेगा और न ही उसका प्रतिफल मिलेगा। जैसे कि यदि कृ्षि कार्य में बैल की बजाय उसके बछडे को हल में जोत दिया जाये तो न तो ठीक तरह से खेत की जुताई हो पायेगी और न ही उपज ही भरपूर मात्रा में मिल सकेगी।
वैसे यदि वर्तमान हालातों को देखा जाए तो ये कहावत लाल कृ्ष्ण आडवाणी(स्वयंभू लोह पुरूष) और भाजपा पर बिल्कुल पूरी तरह से फिट बैठती है..:)
* बहुरिया= जुतना/जोतना
*हर=हल

Thursday, August 27, 2009

जैसे उदई, तैसेई भान

3विचार आए


जैसे उदई, तैसेई भान,
न उनके चुटिया, न उनके कान।

----------------------
भावार्थ - इसका अर्थ इस रूप में लगाया जाता है जब किसी भी काम को करने के लिए एक जैसे स्वभाव के लोग मिल जायें और काम उनके कारण बिगड़ जाये।
कहा जा सकता है कि बेवकूफों को काम सौंपने से ही इस कहावत का जन्म हुआ होगा।

Wednesday, August 26, 2009

एक कहावत

2विचार आए
सारा धन लूट गया ,मोहर पर छाप मारे
यह कहावत उस समय इस्तेमाल होती है जब कोई व्यक्ति अपना सबकुछ लूटा कर अंत में जगता है और नगण्य बची हुई चीजो को अपनी- अपनी कह कर बचने कि कोशिश करता है उस समय इस कहावत का इस्तेमाल किया जाता है.

Saturday, August 22, 2009

दो कहावतें मेल से पहुंची

9विचार आए
कहावतें ब्‍लॉग के पाठक न सिर्फ पढ़कर फुर्सत पा लेते हैं बल्कि रोचक टिप्‍पणियां भी करते हैं, कभी सलाहें और मशविरे भी होते हैं। कुछेक कहावतें भी आती हैं। पिछले दो दिनों में दो टिप्‍पणियों में दो कहावतें अतिरिक्‍त आई हैं। प्रस्‍तुत हैं

कमाऊ आवे डरता
निखट्टू आवे लड़ता

यह भेजी है Vandanaजी ने


जबरा मारै रोवै न दे.

यह भेजी है मीनू खरेजी ने

दोनों पाठकों का हृदय से आभार और एक सलाह भी कि क्‍यों न वे खुद इस ब्‍लॉग में कभी कभार कहावतें पोस्‍ट किया करें। इन दोनों कहावतों को मैं समझ सकता हूं लेकिन खुद लेखक जो भाव लेकर लिखता है उसकी बराबरी नहीं हो सकती। इसलिए बिना विश्‍लेषण प्रस्‍तुत है जैसी मिली वैसी की वैसी कहावतें।

Tuesday, August 18, 2009

एक कहावत बिहार की

5विचार आए
बकरे की माई कब तक खैर मनाई


यानि बकरे की माँ का बेटा - बकरा कितने दिन जिन्दा रहे गा ,उसके मोटा - तगडे होने भर का इन्तेजार किया जाता है फ़िर उसे काट कर उसे पलनेवाले खा जाते है। इसलिए बकरे की माँ ज्यादा दिन तक अपने बच्चे होने की खुशी नही मना सकती है।
हम सभी की हालत एक जैसी है कबतक खुशिया मनाये आज नही तो कल वाट लगनेवाली रहती है। खास करके औरतो की । उसके घरवालो को लड़केवालो के सामने आज नही तो कल झुकना पड़ता है लड़की की शादी के लिए, ऐसी मान्यता आज भी हमारे बिहारी समाज में है।

Thursday, August 13, 2009

एक कहावत

4विचार आए
हींग लगे न फिटकरी ,और रंग भी चोखा

यानि मेहनत नही लगना किसी काम में पर उसका परिणाम अच्छा मिल जाना । प्राय दलाली के धंधे को इसी मुहावरे से समझाया जाता है। और आज -कल हमारे देश में नेता, मीडियाकर्मी , डाक्टर सभी इसी मुहावरे के अनुसार जीना चाहते है।

Tuesday, August 11, 2009

1 विचार आए
बासी कढ़ी में उबाल आना

यहाँ बासी कढ़ी का मतलब पुरानी इच्छाओ से है । वक्त बीत जाने के बाद अगर हम उन पालो को जीने की बेकार कोशिश करते है तब शायद यही कहा जाता होगा बासी कढ़ी
में उबाल लाया जा रहा है।

Wednesday, August 5, 2009

एक बंगला कहावत

5विचार आए
धर्मे कोल , बतासे नोडे

धर्मं का चक्का या मशीन हवा यानि कि प्रकृति के नियम से चलता है ।

कोल - मशीन , बतासे - हवा , नोडे - चलना

Monday, July 27, 2009

जुलाहे से लठ्ठमलट्ठा

5विचार आए

सूत न कपास,

जुलाहे से लठ्ठमलट्ठा

--------------------

इसका भावार्थ है किसी ऐसी चीज के लिए लड़ने लगना जिसका कोई अस्तित्व ही न हो।

हमारे बाबा-दादी इसको लेकर एक छोटी सी कहानी सुनाते थे कि एक बार दो पड़ोसियों में आपस में बात हो रही थी। एक खेत खरीदने जा रहा था और दूसरा भैंस खरीदने।

पहले पड़ोसी ने कहा कि तुम अपनी भैंस बाँध कर रखना कहीं हमारे खेत में घुस कर फसल न खा जाये। दूसरे पड़ोसी को यह बुरा लगा उसने कहा कि तुम अपने खेत में बाड़ लगाना क्योंकि भैंस तो मूक जानवर है। उसे बार-बार कैसे रोका जा सकेगा?

बस इसी बात पर दोनों में कहासुनी बहुत बढ़ गई। देखते-देखते दोनों में लाठी-डंडों से लड़ाई भी शुरू हो गई।

सम्भवतः इसी को देखकर यह कहावत बनी होगी।

Friday, July 17, 2009

पंजाब की एक कहावत

7विचार आए
जिदी कोठी ते दाने , ओहदे कमले भी सयाने

यानि जिनके घर में दाने यानि कि अनाज या कहे समृद्धि भरी होती है उनके आवारा लड़को को भी दुनिया सयाना यानि कि समझदार कहती है।

ओहदे - उनके , कमले - आवारा लड़के

Friday, July 10, 2009

एक कहावत

6विचार आए
अन्धो मे , काना राजा


यानि अगर किसी जगह कम पढ़े लिखे या कम हुनरमंद लोग हो वहा कोई जरा ज्यादा पड़- लिख गया हो या थोड़ा ज्यादा हुनरमंद हो तो वो अपनी ही बघारता रहता है। लोग उसी को चुनते है , पूजते है । जैसे इस इलेक्शन मे यूपीऐ अन्धो मे काना राजा बन गई ।

Thursday, July 9, 2009

एक बंगला कहावत

5विचार आए
प्रीत कोरले भेबे कोरो, बेसी चुन लागले , मुख टा केते जबे , कोम होले , स्वाद आसबे न ।

यानि, प्रेम करना हो तो सोच समझ कर करे, ये पान में लगे चुने की तरह होता है। जयादा लग गया तो जीभ जल जाती है। कम लगे तो स्वाद नही आता है।

भेबे - सोच कर , कोरो - करना , होले - होने पर , बेसी - जयादा

Monday, June 22, 2009

अपना फिगर मत बिगाड़ना

11विचार आए
जरणी जणै तो रतन जण, कै दाता कै सूर।
नींतर रहजै बांझड़ी, मती गमाजै नूर।।

यह कहावत मैं कीर्ति कुमार जी के ब्‍लॉग अपनी भाषा अपनी बात से उठाकर लाया हूं।

जरणी- माता
जणै- पैदा करे
रतन- रत्‍न
सूर- शूरवीर
नींतर - नहीं तो
रहजै- रहना
गमाजै - गुमाना

अर्थ: इसमें स्‍त्री को सलाह दी गई है कि अगर पैदा ही करना है तो या तो वीर पुत्र पैदा करना या फिर दाता। वरना बांझड़ी रह जाना। बिना बात अपना नूर मत खो देना। शूरवीरों और दानदाताओं की धरती राजस्‍थान में यह लोकोक्ति बहुत आम है।

Monday, June 1, 2009

एक कहावत बंगाल की

3विचार आए
सोरसे मोद्हे भूत , तहाले भूत केमोन भाग्बे

यानि सरसों में भूत है , तो भूत भागे गा कैसे ? यानि जब समस्या के मूल में ही समस्या है तो समस्या जायेगी कैसे?

Wednesday, May 27, 2009

एक सार्वभौमिक पहेली

3विचार आए
हिन्दयुग्म से साभार
धरा से उगती उष्मा , तड़पती देहों के मेले
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो
########################
यहाँ उपभोग से ज़्यादा प्रदर्शन पे यकीं क्यों है
तटों को मिटा देने का तुम्हारा आचरण क्यों है
तड़पती मीन- तड़पन को अपना कल समझ लो
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो
########################
मुझे तुम माँ भी कहते निपूती भी बनाते हो
मेरे पुत्रों की ह्त्या कर वहां बिल्डिंग उगाते हो
मुझे माँ मत कहो या फिर वनों को उनका हक दो
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो
########################
मुझे तुमसे कोई शिकवा नहीं न कोई अदावत है
तुम्हारे आचरण में पल रही ये जो बगावत है
मेघ तुमसे हैं रूठे , बात इतनी सी समझ लो
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो

Monday, May 11, 2009

सटायर को लिखना आसान नहीं है

6विचार आए
सटायर लिखने वाले को वास्तव में लोकोक्तियों और मुहावरों के इर्द गिर्द घूमना चाहिए ताकि सटायर और अधिक तीखे तथा प्रभावी हों .
जैसे : चाम का वास्ता भैंस को शिकार
            यानी थोड़े से चमड़े  के लिए भैंस को मारना इतना कह देने मात्र से फिजूल खर्च समझ जाएंगे की वे क्या कर रहे हैं

--
गिरीश बिल्लोरे

Saturday, May 9, 2009

पगली क्‍या करती है ?

2विचार आए
गांव करै ज्‍यां गैली करै 

करै- करता है या करती है 
गैली - पगली 
ज्‍यां- की तरह 

यानि जैसा गांव करता है वैसा ही गैली करती है। 
यानि जैसा समूह करता है वैसा ही समूह का एक हिस्‍सा करता है। कई बार बाहरी आदमी किसी जगह आता है तो वह देखता है कि बाकी लोग कैसा व्‍यवहार करते हैं। और उसी के अनुसार अपना व्‍यवहार तय करता है। तब कहा जाता है गांव करै ज्‍यां गैली करे। 

Friday, May 8, 2009

'शहर सिखावे, कोतवाल सीखे'

2विचार आए
'शहर सिखावे, कोतवाल सीखे'
बिहार में प्रचलित इस कहावत में कोतवाल का अर्थ न सिर्फ़ पुलिस बल्कि किसी भी जिम्मेवार अधिकारी के रूप में लिया जा सकता है।
कहावत का अर्थ है- "जिम्मेवारियां ख़ुद ही उन्हें निभाने के तरीके भी सिखा देती हैं, जिस प्रकार शहर ख़ुद ही कोतवाल को सिखा देता है कि उसे व्यवस्थित कैसे रखा जाए।"

Saturday, May 2, 2009

मारी थोड़ी घींसी घणी

4विचार आए
कांई करूं म्‍हारै घर रो धणी - मारी थोड़ी घींसी घणी 

इस कहावत को समझाने के लिए पहले एक कथा बताना चाहूंगा। 
एक औरत बड़ी कर्कशा थी, घर वालों से ही नहीं आस-पड़ोस और आने- जाने वालों से भी लड़ती झगड़ती रहती थी। इसलिए सभी उससे रुष्‍ट रहते थे। एक बार घर में कोई फंक्‍शन था सो पाहुणे घर आए हुए थे। तो उनसे भी झगड़ने लगी। पाहुनों ने दीए की लौ कम की और उस औरत की जमकर पिटाई की। हो-हल्‍ला सुनकर घर के समीप ही धुणी लगाने वाला एक साधु और पड़ोसी गंगू तेली भी आ गए। साधु चिढ़ा हुआ था क्‍योंकि कर्कशा स्‍त्री सदा उसकी शांति भंग करती रहती। पड़ोसी तो सबसे ज्‍यादा पीडि़त था। घर में आते ही उन्‍हें माजरा समझ में आया तो उन्‍होंने भी अपने हाथ साफ किए और जमकर दो चार लगाए। कुछ देर बाद जब उस महिला का पति घर आया तो वह औरत फिर से चिल्‍लाने लगी और पाहुंनों पर दोषारोपण करने लगी। पति ने सोचा रोज की तरह वातावरण खराब कर रही है। सो उसने भी कर्कशा को पीटा और फिर खींचकर घर के बाहर दालान में पटक दिया। वह वहीं रातभर पड़ी रही। सुबह जब दूसरी औरतों ने मजा लेने के लिए उससे पूछा कि क्‍या बात है पूरी रात बाहर कैसे पड़ी रही तो वह महिला बोली 

बात कहूं तो बातां झूठी, दियो नन्‍दा कर पांवणा कूटी 
फेर आयग्‍यो मोडियो स्‍वामी, बो भी दो धड़ाधड़ धामी
फेर आयो गंगियो तेली, वै भी दो जमार देली 
कांई करूं घर रो घणी, मारी थोड़ी घींसी घणी... :) 

Friday, May 1, 2009

हंस तो केवल मोती ही चुगेगा

1 विचार आए
क्‍या हंसा मोती चुगै - क्‍या लंघण कर जावै 

लंघण - उपवास

हंस या तो मोती चुगेगा वरना लंघन कर जाएगा। 

इसी बात में सारी बात आ गई । 

Tuesday, April 28, 2009

एक कहावत

8विचार आए
जातो गवाए , भातो न खाए

यानि कि जिस किसी कारण से किसी ने अपना अस्तित्व खोया या अपनी पहचान खोयी ,वो काम भी पूरा नही हुआ और पहचान भी गई ।
यानि पहचान भी गई और काम भी नही हुआ ।
जातो - जाति भात - भोजन ,चावल

Friday, April 24, 2009

ब्‍लॉग के बीस नहीं इक्‍कीस लेखक हैं

6विचार आए

इस ब्‍लॉग में अब तक इक्‍कीस ब्‍लॉगर लेखक के रूप में जुड़ चुके हैं। इनमें से कुछ इतने सक्रिय हैं कि

वे नित नई कहावतों से दूसरों को भी सक्रिय कर देते हैं। पिछली पोस्‍ट में मैं सतीश चंद्र सत्यार्थी जी का नाम भूल गया था। इस गलती को सुधारते हुए पेश है कहावत प्रेमियों की लिस्‍ट।

इस ब्‍लॉग के लेखक

Monday, April 20, 2009

कहावतों के इक्‍कीस प्रेमी

11विचार आए
इस ब्‍लॉग में अब तक बीस ब्‍लॉगर लेखक के रूप में जुड़ चुके हैं। इनमें से कुछ इतने सक्रिय हैं कि 
वे नित नई कहावतों से दूसरों को भी सक्रिय कर देते हैं।
इस ब्‍लॉग के लेखक 
इनमें से अधिकांश लेखकों ने किसी ने किसी समय पर तूफानी पारियां खेली 
और अब भी कई बार चौके छक्‍के मारकर निकल जाते हैं। 
इससे आंचलिक कहावतों का एक ऐसा संदर्भ कोष तैयार हो रहा है 
जो आने वाली पीढ़ी के काम आ सकता है। 
इसके पीछे एक और अभिलाषा है कि आंचलिक कहावतों में से समानार्थक कहावतों को लेकर 
उनका विश्‍लेषण भी किया जाए। 
हालांकि कुछ कहावतें ऐसी आ चुकी हैं 
लेकिन अभी और बहुत सी कहावतों का इंतजार यह ब्‍लॉग कर रहा है। 
उम्‍मीद करता हूं कि भविष्‍य में और भी गुणीजन इस ब्‍लॉग से जुड़ेंगे 
और इस संदर्भ कोष को समृद्ध करने में सहायता करेंगे। 

टके का कमाल

0विचार आए
यह पोस्‍ट रतनसिंह शेखावतजी के ब्‍लॉग से ली गई है। उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग में प्रकाशित सभी कहावतों को इस ब्‍लॉग में शामिल करने की अनुमति दी है। इसके लिए उनका आभार... 
टका वाळी रौ ई खुणखुणियौ बाजसी = टका देने वाली का ही झुनझुना बजेगा |

सन्दर्भ कथा ---
एक बार ताऊ मेले में जा रहा था | गांव में ताऊ का सभी से बहुत अच्छा परिचय था सो गांव की कुछ औरतों ने अपने अपने बच्चो के लिए ताऊ को मेले से झुनझुने व अन्य खिलौने लाने को कहा और ताऊ सबके लिए खिलौने लाने की हामी भरता गया | इनमे से एक गरीब औरत ने ताऊ को हाथों-हाथ 4 आने देकर अपने बच्चे के लिए एक झुनझुना लाने का आग्रह किया | सभी औरते ताऊ का मेले से लौटने का इंतजार करती रही और अपने बच्चो को बहलाती रही कि ताऊ मेले गया है तुम्हारे लिए खिलौने मंगवाए है | आखिर शाम को ताऊ मेले से लौट कर आया तो सभी औरतों और उनके बच्चो ने ताऊ को घेर लिया पर उन्हें आश्चर्य के साथ बड़ा दुःख हुआ कि ताऊ तो सिर्फ एक झुनझुना लाया था उस बच्चे के लिए जिसकी माँ ने पैसे दिए थे | ताऊ ने सभी से मुस्कराकर कहा "मैंने मेले में दुकानदार से सभी के लिए खिलौने मांगे थे पर बिना पैसे खिलौने देना तो दूर कोई बात तक नहीं करता | जिसने पैसे दिए ,उसी का बच्चा झुनझुना बजायेगा |

Friday, April 10, 2009

सासु का ओढ़ना, पतोहू का नक्पोछना

2विचार आए

सासु का ओढ़ना, पतोहू का नक्पोछना

अर्थात् एक पीढी की धरोहर दूसरी के लिए मूल्यहीन और अर्थहीन हो जाती हैं।

Wednesday, April 8, 2009

खईता भीम तऽ हगता सकुनी ?

4विचार आए
इस कहावत के शब्द आपको थोड़े असभ्य और असाहित्यिक लग सकते हैं पर कहावतों का असली मजा तो उनके ठेठपन में ही है न! भारत के गांवों में आज भी बातों कों बेबाक और बेलौस तरीके से कहा जाता है। कोई लाग-लपेट नहीं कोई लीपा-पोती नहीं। तो आइये कहावत पर चलें...

खईता - खाएंगे, भीम - महाभारत के एक पात्र, तऽ - तो,
हगता -
मल त्याग करेंगे, सकुनी - महाभारत के एक पात्र

अर्थात जो कर्म करता है वही उसका फल भी पाता है. फल में किसी और की हिस्सेदारी नहीं होती. कर्म अच्छा हो या बुरा उसका फल आपको अकेले ही भोगना है.

सतीश चन्द्र सत्यार्थी

Monday, April 6, 2009

एक कहावत

1 विचार आए
जो करे sharam ,okra fute करम

यानि जो vayakti sharma -sharma कर rah jata है वो जीवन me कुछ नही कर पता है। यानि शर्म- sharam me kimat phut jati है.

एक कहावत

4विचार आए
जो करे शर्म ,ओकरा फूटे करम

यानि जो व्यक्ति शर्मा -शर्मा कर रह जाता है वो जीवन में कुछ नही कर पता है। यानि शर्म- शर्म में किस्मत फूट जाती है.

Sunday, April 5, 2009

हँसुआ के बिआह में खुरपी के गीत

4विचार आए
हँसुआ के बिआह में खुरपी के गीत


इसका मतलब हुआ माहौल के विपरीत अर्थात बिल्कुल अप्रासंगिक बात करना।
यह कहावत बिहार में बहुत प्रचलित है। अगर किसी विषय पर बात चल रही हो और अचानक कोई एक नयी बात शुरू कर दे तो यह कहावत कही जाती है।

सतीश चंद्र सत्यार्थी

Friday, April 3, 2009

हम करे तो पाप, कृष्ण करें तो लीला

4विचार आए

हम करे तो पाप, कृष्ण करें तो लीला

अर्थात् सामर्थवान के उद्दंड हरकतों को भी ज़माना हल्के से लेता हैं जबकि वही हरकत कमजोर के लिए पाप सामान होती हैं। इसके लिए कृष्ण के उदाहरण से उत्तम क्या हो सकता हैं। कृष्ण ने माखन चोरी से लेकर गोपी से छेड़-छाड तक क्या नहीं किया पर हम सब कुछ लीला मान कर पूजते हैं यदि वह सब ब्रज में किसी और ने किया होता तो उसके कारनामे हम यूँ पूजते? कहते भी हैं "समरथ को नहीं कोई दोष गोसाई..."

Wednesday, April 1, 2009

ऊंदरे रा जाम्‍या बिल ही खोदसी

5विचार आए
ऊंदरे रा जाम्‍या बिल ही खोदसी 

ऊंदरा- चूहा 
जाम्‍या- के पैदा किए हुए 
खोदसी- खोदेंगे 

यानि चूहे के पैदा किए हुए बिल ही खोदेंगे। 

इस कहावत का इस्‍तेमाल प्राय: इस अर्थ में होता है कि जैसा पिता होगा संतान भी वैसी ही होगी। संगीतकार का बेटा संगीतकार और नाई का बेटा नाई। पिता के काम को करने में पुत्र को जोर नहीं आता वह सहज ही इसे करने लगता है। हमारे फोटोग्राफर अजीज भुट्टा जी का पुत्र बहुत छोटी उम्र में ही फोटो खींचने लगा। ऐसी स्थिति में यह कहावत कही जा सकती है। 

Saturday, March 28, 2009

माई गुन बछरू, पिता गुन घोड़...

5विचार आए
माई गुन बछरू, पिता गुन घोड़
नाही ज्यादा त थोड़े-थोड
अर्थात माँ बाप के गुण अपने बच्चो में आते ही हैं यदि बहुत ज्यादा नहीं तो थोड़े ही....

Thursday, March 26, 2009

बुड़बक के इयारी आ भादो के उजियारी

3विचार आए
बुड़बक के इयारी आ भादो के उजियारी

बुडबक = मूर्ख, बेवकूफ; इयारी = दोस्ती, मित्रता; उजियारी = चांदनी

मतलब यह की भादों महीने की चांदनी और मूर्ख की मित्रता का कोई भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि ये कभी भी साथ छोड़ सकती हैं। भादों के बरसाती मौसम में कम काले बादल चाँद को ढँक लें और अँधेरा छा जाए, कोई ठिकाना नहीं। इसी प्रकार मूर्ख और धूर्त मित्र भी कब साथ छोड़ जाए इसका कोई भरोसा नहीं।

सतीश चंद्र सत्यार्थी

Monday, March 23, 2009

मूरख जिंदगी गुजारता है रोते हुए

2विचार आए
ज्ञानी काढ़े ज्ञान सूं 
मूरख काढ़े रोय 

काढ़े - गुजारता है या निभाता है 

कहावत का शाब्दिक अर्थ यह है कि जिस व्‍यक्ति के पास ज्ञान होता है वह अपनी जिंदगी के कड़वे मीठे अनुभवों का आंकलन ज्ञान के साथ करता है वहीं मूर्ख आदमी परिस्थितियों का रोना रोते हुए ही जिंदगी गुजार देता है। 

कई बार हताश होता हूं तो मेरी मां मुझे यह कहावत सुना देती हैं। मैं मूरख बनने की बजाय ज्ञानी बनने की चेष्‍टा करने लगता हूं। :) 

Wednesday, March 18, 2009

एक कहावत

3विचार आए
चढ़ते सूरज को सभी सलाम करते है
यह कहावत मुझे पिछली पोस्ट को पढ़ कर याद आई । यानि जो व्यक्ति ऊपर की ओर उठ रहा है यानि तरक्की कर रहा है उसे सभी पहचानते है या उनके रिश्तेदार बनने की कोशिश करते है। उसका आदर , सम्मान करते है।

Tuesday, March 17, 2009

समय धराये तीन नाम, परशु, परसुआ और परशुराम

4विचार आए

समय धराये तीन नाम,
परशु, परसुआ और परशुराम


अर्थात अच्छे बुरे समय के अनुसार, समाज का दृष्टिकोण एक ही व्यक्ति के लिए बदलता रहता हैं। इसके लिए ऋषि परशुराम का उदाहरण का प्रयोग किया गया हैं। जहाँ बचपन में प्रेम में बालक को परशु नाम से जाना जाता हैं वहीं वक्त बदलने के साथ दारिद्र के कारण उन्हें परसुआ नाम से बुलाया गया। कालांतर में जब उन्होंने विश्व विजय का अभियान शुरू किया तो लोग उन्हें आदर से परशुराम के नाम से बुलाने लगे।

एक कहावत बिहार की

6विचार आए
होम करते हाथ जले
होम का उद्दयेश लाभ से है। अगर होम करते वक्त किसी व्यक्ति का हाथ जल जाए तो पुण्य लाभ की जगह उसे परेशानी या मुसीबत का सामना करना पड़ जाता है।
यानि भलाई का काम करने पर परिणाम अगर बुरा मिले तो इस कहावत का इस्तेमाल किया जाता है।

Saturday, March 14, 2009

चोरन गारीं दें

3विचार आए

चीज न राखैं आपनी,
चोरन गारी दैं।
--------------
भावार्थ -
इसका अर्थ सीधा सा है कि कुछ लोग हैं जो अपने सामान की रक्षा तो करते नहीं हैं बाद में चोरी हो जाने पर चोरों को गाली देते फिरते हैं। कहने का तात्पर्य है कि हमेशा स्वयं ही अपने सामान या फिर अपने अधिकारों के लिए सचेत रहना चाहिए।

प्रेरक कथाओं का ब्‍लॉग

2विचार आए
इन दिनों दूसरों के लिखे ब्‍लॉग लगातार पढ़ रहा हूं। एक साल बाद कुछ लोग ऐसे मिले हैं जिन्‍हें पढ़कर लगता है ठीक है कुछ देर रुकते हैं कहीं और से भी रोशनी आ रही है। इन दिनों एक ब्‍लॉग का तो बस फैन ही हो गया हूं। इस ब्‍लॉग के लेखक को तो मैं नहीं जानता लेकिन इस ब्‍लॉग की हर पोस्‍ट को अच्‍छी तरह पढ़ चुका हूं। ब्‍लॉग का नाम है


इसमें निशान्‍त मिश्र जी ऐसी सुंदर कथाएं संग्रह की हैं कि दिल चाहता है उनके हाथ चूम लूं। हर एक कथा एक तूफान की तरह दिमाग में घुसती है और पहले से चल रहे तूफान से टकरा जाती है। विचारों का प्रवाह पहले से ही रोलर कोस्‍टर पर बिठाए रखता है। इसके साथ निशांतजी के झोंके जैसे उद्वेलित कर देते हैं। हर पोस्‍ट पढ़ने के बाद कुछ देर के लिए कम्‍प्‍यूटर बंद कर देता हूं। सोचने का मसाला जो मिल जाता है। काफी देर सोचने के बाद दिमाग इतना शांत हो जाता है कि कुछ और लिखने का जी ही नहीं चाहता। मैं इस ब्‍लॉग को ट्रैक्‍यूलाइजर ब्‍लॉग कहूंगा। जहां अधिकांश ब्‍लॉग भड़ास निकालने या पानी में हलचल बढ़ाने का काम कर रहे हैं वहीं ये प्रेरक कथाएं दिल और दिमाग को कुछ देर की शांति दे जाती हैं। मेरे ब्‍लॉग पर आने वाले सभी पाठकों को निवेदन करूंगा कि एक बार निशांतजी के ब्‍लॉग पर अवश्‍य जाएं। वहां हर किसी के लिए कुछ खास जरूर मिलेगा। 

Friday, March 13, 2009

एक कहावत

1 विचार आए

ऊट के मुंह में जीरा

यानि किसी बड़ी जरूरत की चीज के लिए छोटा सा बजट अथवा किसी सम्प्पन व्यक्ति को छोटा सा कुछ उपहार देने से उस स्तिथि में यह कहा जा सकता है। या किसी बहुत भूखे व्यक्ति को अगर थोड़ा सा नास्ता परोसा जाए तो भी यह उक्ति आती है।

एक कहावत बिहार की

1 विचार आए
लग्घी से घास खिलाना
यानि दिखावे के लिए कोई काम करना। बांस के मुंह पर घास रख कर गाय या घोडे को घास खिलने से वो कितना खा सकता है? बस दिखावे के लिए ऐसी स्थिति में काम किया जाता है। जैसे इलेक्शन के टाइम में नेता जनता को लग्घी से घास खिलते है।

लग्घी - बांस ।

Thursday, March 12, 2009

नंगा और नहाना

6विचार आए
एक कहावत : नंगा नहायेगा क्या और निचोडेगा क्या ?
यानि जो व्यक्ति नंगा हो वो अगर नहाने बैठेगा तो क्या कपड़ा उतारेगा और क्या कपड़ा धोएगा और क्या कपड़ा निचोडेगा। मतलब " मरे हुए आदमी को मार कर कुछ नही मिलता" ।
होली की शुभ कामनाये सभी को।
माधवी

Tuesday, March 10, 2009

तोरा बैल मोरा भैंसा, हम दूनों के संगत कइसा?

5विचार आए
तोरा बैल मोरा भैंसा, हम दूनों के संगत कइसा?

गावों में अभी भी खेत जोतने के लिए बैल या भैंसों का उपयोग किया जाता है। सामान्यतः हल में या तो एक जोड़ी बैल या फ़िर एक जोड़ी भैंसे लगाए जाते हैं। एक बैल और एक भैंसा नही लगाया जाता। कई बार किसानों के पास एक जोड़ी जानवर नहीं होते, एक ही होता है. ऐसे में दो किसान जानवरों की साझेदारी करके काम चलाते हैं. इस कहावत का शाब्दिक अर्थ है कि तुम्हारे पास बैल है और मेरे पास भैंसा इसलिए हम दोनों में मित्रता का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

पर इसका वास्तविक अर्थ है कि दो असमान गुणों और प्रकृति वाले व्यक्तियों के बीच कभी मित्रता नहीं हो सकती और अगर हो भी गई तो ज्यादा दिन नहीं टिकती।

आगे बैजू पीछे नाथ

2विचार आए
आगे बैजू पीछे नाथ

(बैजू = बदमाश और मूर्ख व्यक्ति, नाथ = विद्वान या समझदार व्यक्ति)

इस कहावत का अर्थ यह है कि अगर दो व्यक्ति खड़े हों और उनमें से एक बदमाश और मूर्ख तथा दूसरा विद्वान हो तो पहले मूर्ख को नमस्कार करना बेहतर होता है क्योंकि विद्वान व्यक्ति स्थिति को समझते हुए इसका बुरा नहीं मानेगा परन्तु ऐसा न करने पर मूर्ख व्यक्ति इसे अपना अपमान मानकर नाराज हो सकता है।

Monday, March 9, 2009

भोथर चटिया के बस्ता मोट

4विचार आए
भोथर चटिया के बस्ता मोट

(भोथर = पढाई में मंदबुद्धि/मन न लगाने वाला, चटिया =विधार्थी, बस्ता = किताब का थैला, मोट = मोटा, भारी )
इसका अर्थ है कि जो विद्यार्थी पढने में मूढ होते हैं वे दिखाने के लिए ढेर सारी किताबें थैले में लेकर चलते हैं.
यह कहावत बिहार के अधिकाँश जिलों में बहुत प्रचलित है. पढाई में पिछडे लड़कों को उलाहना देने में इसका उपयोग किया जाता है.

Saturday, March 7, 2009

ख़ुद करे तो खेती

5विचार आए

खुद करै तो खेती,
नईं तौ बंजर हैती।

-------------------------------

भावार्थ -

इसका अर्थ यह है कि हमें अपने काम स्वयं करने चाहिए। किसी के भरोसे पर काम छोड़ने से उसमें हानि ही होती है। इसी कारण से इस कहावत में खेती का उदाहरण दिया गया है।

एक कहावत

1 विचार आए
बूढा - बालक एक सामान ।
यानि बूढा व्यक्ति और बच्चें की हरकते एक जैसी होती है , इस लिए क्षम्य होती है। दोनों की बदमासियों को नजर अंदाज कर देना चाहिए।

एक कहावत

2विचार आए
बड़े हुआ तो क्या हुआ , जैसे पेड़ खजूर ; पंछी को छाया नही फल भी लगे अति दूर ।

यानि अगर आप बड़े/ धनवान / संपन्न हुए तो क्या हुआ, पर आप की अवस्था तो किसी कंजूस की तरह है जो सिर्फ़ अपने आप तक ही सीमित रहता है , जैसे खजूर के पेड़ से किसी को फायदा नही पहुचता , न ही राहगीर को छाया मिलती है न ही पंछी उस पर बैठ पता है। वैसे ही कंजूस व्यक्ति से समाज का कोई भला नही होता।

Thursday, March 5, 2009

मन मन भावै, मुड़ी हलावै

3विचार आए

मन मन भावै,
मुड़ी हलावै।

मुडी - सिर

भावार्थ -

इसका अर्थ है कि मन ही मन में तो किसी बात के प्रति हाँ रहती है पर बाहर से उसे मना करने का दिखावा किया जाता है।

रत्ती रती साधे

0विचार आए

रत्ती रत्ती साधै तौ द्वारै हाती होयै।
रत्ती रत्ती खोबै तो द्वारै बैठके रोये।।

भावार्थ -

इसका अर्थ है कि यदि थोड़ा-थोड़ा करके जोड़ा जाये तो धन-सम्पदा प्राप्त होती है। इसे ही सांकेतिक रूप में हाथी बांधने से समझाया गया है। इसी तरह यदि थोड़ा-थोड़ा ही गंवाया जाता रहे तो रोने की नौबत आ जाती है। अर्थात हमेशा सोच-समझ कर ही खर्च करना चाहिए।

Wednesday, March 4, 2009

एक कहावत

1 विचार आए
बाढे पूत पिता के धर्मे, खेती उपजे अपने करमे।
यानि बेटा पिता के पुण्य प्रताप से बढ़ता है , और किसान की खेती अपने कर्म का परिणाम होती है। यानि की मेहनत का।

एक कहावत बिहार की

0विचार आए
मरला पूत के भर -भर आँख ।
यानि की जो व्यक्ति इस दुनिया से चला गया हो हम उसका गुन- गान करते है उसके बारे में उसकी बड़ाई करते है ,और (बे) मतलब के आसू उसके लिए बहते है । जब वही व्यक्ति जिन्दा रहता है तो हम उसकी परवाह भी नही करते और जम कर उसकी बुराई करते हो ।

एक कहावत बिहार की

5विचार आए
अधकल गगरी छलकत जाए
जिस व्यक्ति में आधा - आधुरा ज्ञान हो गा वो बहुत ज्ञान बघारने की कोशिश करता है। जैसे आधी भरी हुई गगरी से पानी छलक कर गिरता है। किंतु भरी हुई गगरी से पानी छलकता नही है। अंग्रेजी में एक कहावत है - कम ज्ञान बहुत खतरनाक बात है...

Tuesday, March 3, 2009

एक कहावत

13विचार आए
न नौ मन तेल होगा , न राधा नाचेगी ।
ये कहावत की बात पुरी तरह से याद नही आ रही है, पर हल्का- हल्का धुंधला सा याद है कि ऐसी कोई शर्त राधा के नाचने के लिए रख्खी गई थी जिसे राधा पुरी नही कर सकती थी नौ मन तेल जोगड़ने के संदर्भ में । राधा की माली हालत शायद ठीक नही थी, ऐसा कुछ था। मूल बात यह थी कि राधा के सामने ऐसी शर्त रख्खइ गई थी जो उसके सामर्थ्य से बाहर की बात थी जिसे वो पूरा नही करपाती। न वो शर्त पूरा कर पाती ,न वो नाच पाती।

Monday, March 2, 2009

एक कहावत

7विचार आए
दूर का ढोल सुहाना लगे है ।
अग्रेजी में इसे ही कहते है " द ग्रास इस ग्रीन अल्वाय्स ओन द अदर साइड " यानि कि कोई भी चीज दूर से बहुत अच्छी लगती है। पर पास जाने पर उसकी खामिया हमें दिखायी पड़ने लगती है।

Friday, February 27, 2009

एक कहावत

3विचार आए
नाचे न जाने अगनवा टेढा
यानि नाचना तो आता नही है और दोष मन्धरहे है किसी के घर के आँगन पर की जी आपका तो आँगन टेढा है हम नाचे तो नाचे कैसे। ऐसा हमारे जीवन में भी होता है की कोई व्यक्ति कामकरना नही जानता पर वो दोष किसी दूसरे पर मन्ध देता है या किसी सामान या परिस्थिति पर मंथ देता है।

Thursday, February 26, 2009

एक कहावत

4विचार आए
अति सर्वत्र वर्जिते ।
अति यानि जरूरत से ज्यादा ,हर कही वर्जित होता है यानि मना । क्योकी यह कहते है - सीता क्यो हरी गई , क्यो की वो अत्यधिक सुंदर थी, रावन क्यो मारा ,क्यो की उसमे बहुत अंहकार था.इस लिए अपने जीवन में हमें बैलेंस रखना चाहिए । किसी भी चीज के फीचे जयादा नही दौड़ना नही चाहिए।

Tuesday, February 24, 2009

फरसे का लैणायत

4विचार आए
यह कहावत देखने में ऐसा लगता है कि खराब शब्‍दों से बनी है लेकिन है मजेदार और ज्ञान देने वाली भी है। 

गांड रो गड़ और फरसे रो लैणायत 

गांड- गुदा द्वार 
गड़ - जो चुभता है 
फरसा- घर के सामने का स्‍थान 
लैणायत- वह जिसने आपको उधार दिया है 

इसका अर्थ यह हुआ कि गुदा में चुभने वाला यानि मलद्वार का मस्‍सा और घर के सामने रहने वाला लेनदार कभी नहीं होना चाहिए। दोनों नियमित रूप से दुख देते हैं। मस्‍सा रोजाना सुबह तंग करेगा तो लेनदार घर से निकलते घुसते मुस्‍कुराएगा तो भी ऐसा लगेगा कि उधार के रुपए वापस मांग रहा है। इस कारण दोनों की नहीं रखने चाहिए। इसमें दोनों की तुलना भी है और दोनों से बचने की सीख भी दी गई है। 

Saturday, February 21, 2009

एक bihari कहावत

6विचार आए
दिन भर औरे बौरे , रात को दिया लेकर दौड़े
यानि जब काम करने का समय होता है तब यहाँ -वहा जा कर समय नष्ट कर देते है । पर जैसे ही सर पर काम सवार हो जाता है ,तब जमीं आसमान एक कर दिया जाता है उस काम को निपटने के लिए।चुनाव के समय नेता अपने चुनाव kshtra ke liye यही काम करते है।

Friday, February 20, 2009

एक bihari कहावत

2विचार आए
जेकरा भातर पुच्बे न करे , ओकरा मागवा में भर- भर सिन्दूर
यानि जिसका पति अपनी पत्नी को प्यार नही करता है , उसकी मांग में पुरा सिन्दूर भरा रहता है.यानि वो ज्यादा दिखाना चाहती है कि उसका पति उसे ज्यादा प्यार करता है।
यह बात इस सन्दर्भ में भी कही जा सकती है कि जो व्यक्ति बहुत दुखी रहता है , वो और जयादा हसने कि कोशिश करता है या हँसता है .

Wednesday, February 18, 2009

एक bihari कहावत

5विचार आए
भाड़ में जाए दुनिया , हम बजाई हरमुनिया
मतलब कि इसमे jindadil /beparwah एक इन्सान के बारे में कही गयी है। तमाम मुसीबतो के बीच में ek इन्सान जब थक जाता hai तब वो कहता hai कि दुनिया जाए जहनुम में ,मैअपना काम / मौज करता हु।

Friday, February 13, 2009

ज्ञान दर्पण से मिली कहावतें

2विचार आए
आज ज्ञान दर्पण ब्‍लॉग में कुछ अच्‍छी कहावतें देखीं। आप भी उनका रसास्‍वादन कर सकते हैं। यह ब्‍लॉग रतन सिंह शेखावत लिखते हैं और अपने आप में बहुत खूबसूरत ब्‍लॉग है। 
कुछ राजस्‍थानी कहावतें पोस्‍ट में उन्‍होंने 
घोड़ा रो रोवणौ नीं,घोड़ा री चाल रौ रोवणौ है
म्है ही खेल्या अर म्है ई ढाया 
3  आज री थेप्योड़ी आज नीं बळे

कहावतें शामिल की हैं। तीनों कहावतें बेहद खूबसूरत हैं और ज्ञानवर्द्धक भी। 

अगहन, पूस, माघ, फागुन.....

7विचार आए
अगहन माह खाओ तेल, पूस में करो दूध से मेल।
माघ मास घी-खिचड़ी खाए, फागुन उठके सुबह नहाय।


बिहारी जनमानस में कहावतों के माध्यम से भी अलग-अलग मौसम के लिए खान-पान के सबंध में सुझाव दिए गए हैं।
ऐसी ही एक कहावत के अनुसार अगहन माह में तेल युक्त भोजन, पूस में दूध के पदार्थ, माघ में घी-खिचड़ी और फागुन में प्रातः काल स्नान स्वास्थ्य के लिए उत्तम है।

Thursday, February 12, 2009

एक कहावत बिहार की

1 विचार आए
अगुली पकड़ क , पंहुचा पकड़ना
यानि कि किसी की अंगुली पहले पकड़ लो फिर धीरे- धीरे उसका पूरा हाथ अपनी गिरफ्त में लेलो। ये प्राय तब कहा जाता था कि मान लो किसी आदमी को बैठने भर की जगह दी गयी हो और वो पूरा पसर जाए मौके का फायदा उठा कर।

Wednesday, February 11, 2009

एक bihari कहावत

3विचार आए
रूपवाली रोये भागवाली खाए
यानि कि जिस महिला के पास रूप हो पर उसके पास भाग्य नही हो तो उसका पति न मानेतो बेचारी का जीवन रोते बीतता है, पर कोई महिला जिसका भाग्य बहुत तेज हो पर वो उतनी सुंदर न हो पर उसका पति उसे माने तो उसका जीवन बहुत सुंदर बीतता है.उस ज़माने के हिसाब से ये कहावत बनी थी जब स्त्री का जीवन सिर्फ़ पति कि स्वीकारोक्ति पर निर्भर रहता था। इसमे भाग्य कि महत्ता को स्वीकार गया है.यह बात सर्वविदित है.

Monday, February 9, 2009

बिना इच्‍छा के...

5विचार आए
मन बारां पोवणा घी घालूं कण तेल 

बारां- बिना 
पोवणा- बनाना जैसे खाना या कोई पकवान या रोटी बनाना 
घालूं- डालूं 
कण का इस्‍तेमाल या के रूप में हुआ है 

बिना मन के बनाना है हलवे में घी डालूं या तेल डालूं। 
इसका अर्थ हुआ कि जो काम करने की इच्‍छा ही नहीं है उसे कैसे अच्‍छा करने की कोशिश हो सकती है। उसके लिए तो यही दिमाग में आएगा कि घी डालें या तेल बनना तो खराब ही है। हमारे सामने में ऐसा सवाल कई बार आता है जब हमारे ऊपर काम बेवजह लाद दिया जाता है और हम बिना इच्‍छा के कर रहे होते हैं। तब यही बात दिमाग में आती है। 

Wednesday, February 4, 2009

एक कहावत

3विचार आए
निकले हरिभजन को , ओटन लागल कपास
मतलब निकले तो थे हरि यानि की भगवन का नाम स्मरण करने के लिए पर रस्ते में निकलने के बाद कपास यानि की रुई धुनने लगे। इसका दूसरा मतलब यह भी होता है कीआप निकले तो घर से थे कुछ काम करने के लिए पर करने कुछ और लग गए। ये विद्यार्थी , युवा, पत्रकार, नेता हम सभी पर लागू होता है.

Tuesday, February 3, 2009

एक bihari कहावत

5विचार आए
सास से बैरी पुतोहिया से नाता , येही कुल रहिये जईबे बिधाता ।
यानि सास से तो बैर है यानि दुश्मनी पर उसकी बहु से प्रेम .इसका मतलब शायद यह भी होता हो कि किसी घर के बड़े से तो दुश्मनी करो पर उसी घर से छोटे सदस्य से दोस्ती करो ताकि उस घर का टोह लिया जासके

Saturday, January 31, 2009

एक bihari कहावत

2विचार आए
नौ जाने छ जनबे न करे

यानि आप नौ की संख्या तो जानते है पर छ की संख्या नही जानते। यानि आप को बाद की घटनाये तो मालूम है पर उसके पहले की नही । ये प्राय उस सन्दर्भ में कहा जाता है जब कोई व्यक्ति किसी विषय को जान कर भी अनजान बनना चाहता है .

Monday, January 26, 2009

गणतंत्र की जय हो .

2विचार आए

Thursday, January 22, 2009

सौ कोस तक घी खाते रहो

6विचार आए
आपरो घी सौ कोसे हालै

आपरो- खुद का
कोस- तीन किलोमीटर की दूरी
हालै- चलता है

यानि खुद का घी सौ कोस (एक कोस लगभग तीन किलोमीटर का होता है।) तक काम आता है।
इस कहावत को लेकर मेरे दिमाग में आज तक कंफ्यूजन है। इसका एक अर्थ तो यह हुआ कि घर का निकाला हुआ घी खाया हो तो तीन सौ किलोमीटर तक बिना थके चल सकते हैं। यानि बीकानेर से जयपुर तक। लेकिन जहां इस्‍तेमाल होता है वहां इसका यह अर्थ नहीं होता। मेरी पड़नानीजी, जिनकी जबान खुलती तो अखाणों (कहावतों) के साथ शब्‍द तैरते हुए आते और तीर की तरह सटीक होते, ने मुझे समझाया कि ऐसा नहीं है घी खाकर चलने से बेहतर है किसी और को अपना घी दे दो। सौ कोस के बाद तुम्‍हे वापस मिल जाएगा। ये कुछ टेढ़ी बात हुई। यानि आज आपने किसी और को घी खिलाया है। अब घी भी सिंबोलिक हो चुका है और दूरी भी। आज खिलाया है तो कल या सौ कोस दूर कहीं भी कभी भी वापस काम जरूर आएगा।

मैंने कोशिश तो की है लेकिन इस कहावत की गहराई कुछ और अधिक है। मैं खुद तो आनन्‍द ले पा रहा हूं लेकिन व्‍यक्‍त नहीं कर पा रहा। जो लोग पढ़ें वे गुणकर शायद इसका आनन्‍द ले सकेंगे।

Monday, January 19, 2009

एक बंगला कहावत

3विचार आए
तेलेर मथाये तेल ।

अर्थात जिसके सर पर तेल हो उसके सर पर लोग और तेल लगते है। यानि जिनके पास पैसा होता है लोग उन्हें और सम्मान, पैसा देते है। यही दुनिया है.

Friday, January 16, 2009

एक bihari कहावत

3विचार आए
घी का लड्डू टेढो भला ।

इस का अर्थ यह होता है कि घी के लड्डू का स्वाद महत्वपूर्ण होता है ,कैसा दीखता है ये मायने नही रखता.इस कहावत का प्रयोग प्राय लड़को के संदर्भ में किया जाता है, कि उनकी सकल -सूरत मायने नही रखती वरन उनका होना ही अपने आप में महत्वापूर्ण है।

Wednesday, January 14, 2009

bihari कहावत

1 विचार आए
रस्सी जल गैल ,पर ऐठन न गैल ।

यानि कि वैभ्व या सत्ता तो खत्म हो गई पर नखरे नही खत्म हुए। ये हम नेता , नौकरशाह ,अभिनेता के सन्दर्भ में कह सकते है। जो चुनाव हर जाने पर या नौकरी ख़तम हो जाने पर या मार्केट रेट ख़तम हो जाने पर भी नखरे करने से बाज नही आते और अपने पुराने दिनों को याद कर - कर के वैसे ही नखरे दिखाते है।

चलबे न करब ना त मेड़ उखाड़ देब|

0विचार आए
इस भोजपुरी कहावत का भाव है "अति" करना ठीक नही होता| या तो चलेंगे ही नही, और अगर चलेंगे तो ऐसे की मेड़ (पगडण्डी) उखड़ जाए|

Tuesday, January 13, 2009

bihari और बंगाली कहावत

4विचार आए
bihari कहावत - " कम्बल ओढ़ कर घी पिए है "
बंगला कहावत -" डूबे- डूबे जोल khawa "
दोनों कहावतो का मर्म एक ही है कि छुप छुप कर अपना काम करना ya maje lena bina kuch logo ko pata lage.
jol kawa - pani pina

Saturday, January 10, 2009

ek aur bihari kahawat

2विचार आए
"ताड़ के पेड़ के नीचे दूध पिए से ओ , लोग सब एहे कहेबे कि ई ताडी पिए है "

बिहार खास कर पटना के इलाके में यह कहा जाता है कि ताड़ के पेड़ के नीचे प्राय लोग नशा करने जाते है ताडी(एक प्रकार की शराब ) पीकर । ऐसी स्थिति में कोई भला मानुस अगर ताड़ के पेड़ के नीचे दूध भी पीता है तो लोग उसके बारे में यही सोचते है कि वो आदमी ताडी पी रहा है.यानि जैसी सांगत या जैसी जगह में आप रहेगे लोग आपके बारे में उसी तरह की धारणा बनाये गे.इसलिए दोस्तों और स्थान का चयन सावधानी से करना चाहिए.

Thursday, January 8, 2009

एक बंगला की कहावत

5विचार आए
जेखाने चास होए , से खाने बास होए ना
जे खाने बास होए , से खाने चास होए ना।
अर्थात आदमी जहा रहता है वहा खेती यानि कारोबार नही करता , जहा खेती या कारोबार करता है वहा रहता नही है। मतलब जमीन एक ही चीज के लिए उपयोग में लाई जाती है। पुराने ज़माने में घर के बड़े बुजुर्ग घर और bahar
में परदा रखने की हिदायत दिया करते थे।
बंगाल में इस कहावत का इस्तेमाल इस बात पर भी किया जाता है किनौकरी करने कि जगह पर थोते प्रेम प्रसंग नही पाले जाते है , और जहा प्रेम करते है वहा से ग़लत फायदा कमाने कि कोशिश नही करनी चाहिए।

जे खाने - जहा ; बॉस - रहने की जगह ; चास -खेती करना .

Wednesday, January 7, 2009

पड़ग्‍या खल्‍ला उडगी रेत

0विचार आए
पड़ग्‍या खल्‍ला उडगी रेत
फूल बगर जिस्‍सी होयगी रे

पड़ग्‍या- पड़े हैं
खल्‍ला - जूते
उडगी- उड़ गई या झड़ गई
फूल बगर - फूल की तरह
जिस्‍सी - जैसी

जूते पड़ने से शरीर पर पड़ी धूल झड़ गई। इससे वह खुद को फूल की तरह हल्‍का महसूस कर रही है। यह कहावत आमतौर पर बड़ी बूढी महिलाएं नई छोरियों को व्‍यंग में कहती है। इसका अर्थ यह है कि डांट-फटकार खाने के बाद भी लड़की पर असर नहीं है। उलटे वह अधिक उत्‍श्रंखल हो रही है। यहां धूल शर्म और फूल की तरह हलकापन ढिठाई के लिए काम में लिया गया है।

एक कहावत बंगाल की

0विचार आए
साग दिए माछ चापा जाय ना ।
अर्थात साग से मछली पकाने की खुसबू को आप ढक नही सकते। कहानी कुछ इस तरह से है किएक महिला मछ्ली पका रही थी , तभी उसके घर मेहमान आगये। महिला ने जल्दी में मछली को छिपाने के लिए उसपर साग छोक दिया ,पर मछ्ली कि खुशबू को वो छिपा नही पाई .प्राययह कहावत प्रेम करने वालो के सन्दर्भ में कहा जाता है ,जब वो प्रेम को दोस्ती के दुप्पट्टे से ढकने कि कोशिश करते है।
माछ - मछ्ली , चापा - ढकना .दिए - द्वारा

एक कहावत बिहार की

1 विचार आए
नया नौ दिन , पुराना सौ दिन
इसे आप इस सन्दर्भ में ले सकते है कि ओल्ड इस गोल्ड "। नए विचारो, कवियों के सन्दर्भ में भी बात कही जा सकती है कि पुराने कवि- रहीम ,तुलसी , कबीर आज भी प्रासंगिक है जबकि नए कवियों कि फसल कब आती है कब जाती है कुछ पता ही नही चलता।

Tuesday, January 6, 2009

चार दिन के गईले, सुग्गा मोर बन के अइले

1 विचार आए
चार दिन के गईले, सुग्गा मोर बन के अइले|

भोजपुरी कहावत

कोई व्यक्ति जब चार दिन शहर में रह कर वापस गाँव जाए और चाल ढाल से ख़ुद को शहरी बताये तो उसके लिए यह कहावत कही जाती है| चार दिन शहर में रहकर सुग्गा (तोता) ख़ुद को मोर समझने लगा|

Monday, January 5, 2009

एक bihari कहावत

2विचार आए
पुतके पाव पलना में ही दिखे है।
अर्थात होन्हर वीरवान के होत चिकने पात ,अगर किसी बच्चे में कुछ अच्छे या बुरे गुण हो तो वो बचपन से ही प्रगत होने लगते है। वो गुण छिपते नही है, जैसे श्री कृष्ण के गुण बचपन से ही प्रगटहोने लगे थे।

एक bihari कहावत

2विचार आए
बौआ बगल में , ढ्न्डोरा नगर में।
अर्थात बच्चा घर पर ही है , और सारे शहर में शोर होगया है की बच्चा खो गया ।
ये भी कह सकते है कि जो चीज खो गयी हो उसे पहले घर में ढूढ़ नी चाहिए , फिर सारे शहर में शोर करना चाहिए।

एक कहावत

0विचार आए
घर की मुर्गी दाल बराबर ।

मतलब की सारे शहर में जिसे इज्जत मिलती हो पर घर में उसकी कदर नही होरही हो.

एक और bihari कहावत

0विचार आए
गुड खाए , गुलगुला से परहेज करे।

अर्थात गुड तो खाते है पर गुड से बनी मिठाई गुलगुला नही खाए गे । यानि की कह सकते है रिश्वत तो खाए गे पर रूपये की जगह तोहफा लेगे .या यू कह सकते है चिक्केन नही खाए गे पर चिक्केन सूप peeye गे .

Sunday, January 4, 2009

घर का जोगी जोगडा़

7विचार आए
घर का जोगी जोगडा़, आन गाँव का सिद्ध

"दूर का ढोल सुहावन" के तर्ज पर यह कहावत गढी गयी है। जोगी (योगी) की अपने घर मे कद्र नहीं होती, लेकिन किसी दुसरे (आन) गाँव में उसे सिद्ध महात्मा बताया जाता है।

Saturday, January 3, 2009

उजडल गाँव में ऊँट आइल

0विचार आए
उजडल गाँव में ऊँट आइल, लोग कहे बलबल|| किसी उजडे हुए गाँव में जहाँ किसी ने ज्यादा दुनिया नही देखी है वहां अगर ऊँट आएगा तो लोग कहेंगे ये बलबल है,(ऊँट मुहं से बल बल की आवाज निकालता है!!)

एक और bihari कहावत

6विचार आए
बात छिले से रुखा होए , लकडी छिले से चिक्कन ।
मतलब बात को जितना बढाये गे उतनी ही कड़वी हो गी , पर लकडी को जितना ही रगड गे वो उतनी ही सुंदर होगी .अर्थात चीजो की अलग -अलग प्रकृति पर निर्भर करता है कि उसके साथ एक जैसा सलूक हो रहा है और उसके परिणाम अलग आ रहे है।

Friday, January 2, 2009

चलनियऊ बोले, जामें बहत्तर छेद

2विचार आए
सूप तो सूप,
चलनियऊ बोले,
जामें बहत्तर छेद।
इसका तात्पर्य ऐसे लोगों से है जो ख़ुद में कुछ भी नहीं होते पर दूसरों के सामने ख़ुद को साबित करने में लगे रहते हैं। इसका एक अर्थ ये भी है किअपने दोषों को देखे बिना दूसरों के दोष बताने की कोशिश करते रहते हैं।

सूप और छ्लनी

2विचार आए
"सूप दूसे छलनी के जेकरा बह्त्तर गो छेद "

यह भी एक बिहारी कहावत है जिसके पीछे कहानी कुछ ऐसी है कि एक बार सूप और छलनी में लडाई हो गई , तो छलनी ने सूप से कहा कि तुम्हारे तो सारे बदन पर छोटे- छोटे छेद है.तो सूप ने कहा की तुम्हारे बदन में तो मुझसे भी बड़े छेद है।
इसका तात्पर्य यह है की कोई ग़लत इन्सान जब किसी दूसरे ग़लत इन्सान की बुराई करता है तो मामला इस कहावत का बनता है। जैसे एक अपराधिक छवि वाला नेता जब दूसरे नेता का अपराधिक रिकॉर्ड गिनवा रहा होता है तो स्थिति इस कहावत की बनती है।

Thursday, January 1, 2009

कुंजरिया अपने बेर खट्टे न बताये

1 विचार आए

कुंजरिया अपने बेर खट्टे न बताये।

कुंजरिया=सब्जी बेचने वाली

भावार्थ- इसका अर्थ है किकोई भी अपनी वस्तु, अपनी चीज की बुराई नहीं करता है। ये ठीक उसी तरह है जैसे कि सब्जी बेचने वाली अपने बेरों को कभी भी खट्टा नहीं बताती है।

 

मेरे अंचल की कहावतें © 2010

Blogger Templates by Splashy Templates