Skip to main content

Posts

Showing posts from September, 2008
1:
//अम्मा कहेली बेटी नीति उठी आइयह
पापा कहले छौ मास आइयह
भइया कहेले बहिना काजपरोजन
भाभी कहेली जनि आव तुहै//

(मायने- शादी के बाद बेटी को मां कहती है बेटी रोज-रोज आ जाना, पिता कहते हैं छे महीने पर आना, भाई कहते हैं बहन कभी कोई मौका-तीज-त्यौहार पड़े तब आना, भाभी कहती है तुम मत आना,ये शादी के बाद बेटी के प्रति मां का प्यार बताता है। )

2:
//बेटा
मचिया बैठल रउरा अम्मा हे बड़इतीन
जैसन बूझिय आपन धियवा
वैसन बूझियह हे हमरो तिरियवा
मां
-
पुरुब के चांद पश्चिम चली जाइयह
धिया के दुलार पतोह नहीं पाइहें

बहू
-उड़िया के पानी बरेरी चली जाइहें
अवध सिंघोड़वा ननद नहीं पाइहें//

(मायने-शादी के बाद बेटा अपनी पत्नी को लेकर आया है, मां चारपाई पर बैठी है
बेटा- मां जैसे तुम अपनी बेटी को मानती थी उसी तरह मेरी पत्नी को दुलार देना
मां- पूरब का चांद पश्चिम चला जाएगा, मगर बेटी जैसा दुलार बहू नहीं पा सकती
बहू-पानी बहने की जगह उड़कर आसमान की ओर जाने लगेगा लेकिन अब इस घर से ननद को कुछ नहीं मिलेगा )
(शब्द
मचिया-चारपाई, धिया-बेटी, तिरिया-पत्नी, पतोह-बहू, उड़िया-उड़ना, अवध का मतलब अयोध्या से है, सिंघोड़ा सिंदूर रखने का एक छोटा संदूक नुमा होता ह…
मां-मौसी वैसे तो बातों-बातों में कई मुहावरें बोल जाती हैं, कुछ उनकी यादों के पिटारे में से।

//लड़का भीर त जाइब ना
जवनका है भाई
बुढ़ऊ के त छोड़ब न
कितनो ओढ़ियें रजाई

ये जाड़े की धमकी है संभल जाने के लिए
मायने- बच्चे के पास आया तो जाऊंगा नहीं, जवान लोग तो अपने दोस्त की तरह हैं, क्योंकि उनपर ठंड का कोई असर होता नहीं और बूढ़ों को तो किसी सूरत में नहीं छोड़ूंगा चाहे कितनी ही रजाई ओढ़ लें, बूढ़ों को ठंड जल्दी लगती है//

//चोर चाहे हीरे क या खीरे का चोर, चोर ही होता है

नसीहत-चोरी चाहे छोटी हो या बड़ी, वो चोरी ही कहलाती है।//

//आनर गुरू बहिर चेला
मांगे गुड़ देवे ढेला

मायने- अंधा गुरू, बहरा चेला, गुड़ मांगा और दिया पत्थर। ये मूर्खता पर किया गया व्यंग है। //


एक टिप्पणी इधर भी

चिट्ठा चर्चा, में स्वर्गीय-श्री प्रह्लाद नारायण मित्तल से मुलाक़ात कीजिए,
उड़न तश्तरी ब्लॉग-"आलसी काया पर कुतर्कों की रजाई" डाल कर गज़ब तीर चला दिया
मुझको नहीं पता कविता क्या हैं फ़िर भी लिखे जा रहे हैं उधर लोग बाग़ एक परम स्वादिष्ट कविता , परोसे जा रहें हैं साक़ी शराब दे दे .----कुछ लोग ये गा-गा कर दिन को नशीला बनाने आमादा हैं.बेट्टा, ब्लागिंग छोड़ो ,मौज से रहो, अब भैया का नारा देकर पंडित जी ने गज़ब ढा दिया आँख की किरकिरी-की ताज़ा पोस्ट की "ईश्वर धर्म और आस्था के सहारे मृत्यु का इंतज़ार ही क्या हमारे बुज़ुर्गों के लिए बच गया काम है ?" की इस पंक्ति ने आंख्ने भिगो दीं .शीतल राजपूत के चिट्ठे का स्वागत ज़रूरी है,कुछ दिनों से ब्लॉगन-ब्लागन वार देख के मन खट्टा तो हुआ था किंतु जब ये मारें लातई-लात कहावत देखी तो लगा शायद कोई रास्ता काढ़ लिया जाएगा
माँ कविता प्रति इसे मेरा आभार मानिए .
तैयार रहिये अपने ब्लॉग पर टिप्पणियों की बरसात के लिए , बांचते ही अपन की बांछें खिल गई अपन भी टिप्पणी पाने की दावेदारी बनाम लालच से भरा ब्लागिया दिल लेकर आज की पोस्ट लिख रहें हैं

घर कुलिया में

शान बड़ी,
घर कुलिया में।
==============
कुलिया = छोटी सी गली
==============
ये कहावत का एक छोटा सा हिस्सा है। इसका अर्थ है कि शान या दिखावा तो बहुत किया जाता है पर असलियत में कुछ भी नहीं होता है।
ये कहावत ऐसे लोगों के लिए बनी है जो अकारण अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने में लगे रहते हैं।

अंड को मूसरो

अक्सर देखा जाता है कि किसी काम के लिए कुछ विशेष या निश्चित लोगों की जरूरत होती है और कुछ बिना कारण बीच में हस्तक्षेप किया करते हैं ऐसे लोगों को किसी तरह का कोई लाभ भी नहीं मिलता है और सामाजिक स्थिति भी ख़राब हो जाती है. ऐसे ही लोगों को ध्यान में रख कर ये कहावत बनी होगी- राजा को दूसरो,
अंड को मूसरो और
बकरिया को तीसरो,
परेशान होते है।
======================अंड = एक लकडी जो एकदम खोखली होती है। मूसरो = मूसल, जिससे कुटाई की जाती है। बकरिया = बकरी=======================इसका अर्थ है कि यदि राजा के दो लड़के हैं तो दूसरे को लाभ नहीं होता है क्योंकि राज्य परम्परा के अनुसार बड़े को मिलता है यानी पहले को. इसी तरह अंड की लकडी इतनी खोखली होती है कि यदि उसका मूसल बना लिया जाए तो भी उससे किसी तरह की कुटाई नहीं की जा सकती है. कुछ इसी तरह का हाल बकरी के तीसरे बच्चे का होता है. चूँकि बकरी के दो थन होते हैं और यदि उसके एक साथ तीन बच्चे हो जाते हैं तो तीसरे को हमेशा थन से दूध पीने में दिक्कत आती रहती है.