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Showing posts from March, 2010

तीन बुलाये तेरह आये......

तीनबुलाये, तेरहआये,
देदालमेंपानी।
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इसका सीधा सा अर्थ ये है कि कम की व्यवस्था होने पर अधिक खर्च करना पढ़ जाए तो उसी में कुछ जोड़-तोड़ कर लेना चाहिए। हो सकता है कि किसी समय में इसका अर्थ मितव्ययता से लगाया जाता हो?

दमडी की बुलबुल टका हलाल.........

बहुत दिन हुए इस ब्लाग पर कुछ लिख नहीं पाया। आज अचानक से एक पुरानी कहावत याद आ गई तो सोचा कि क्यों न इसे आप लोगों को भी अवगत कराया जाए।  

जहाँ देखहूं निज अधिक बिगार, लघु लाभहु कर तजहुँ विचार  नहिं यह बुद्धिमान की चाल, "दमडी की बुलबुल टका हलाल" ।।
अब कहावत आप लोगों नें पढ ली है तो लगे हाथ इसका अर्थ भी बता ही दीजिए। भई ऎसा मत सोचिएगा कि मैं कोई पहेली पूछ रहा हूँ या कि मैने आप लोगों के ज्ञान की कोई परीक्षा लेने का मन बनाया है। ऎसा कुछ नहीं है---वो तो बस वैसे ही ज्यादा कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा था तो सोचा कि जितना लिख दिया, उसे ही पोस्ट कर देते हैं। बाकी सब समझदार लोग हैं---खुद ही समझ लेंगें :-)

अरे हाँ, एक ओर कहावत याद आ गई, वो भी पढते चलिए:----

जो कछु लखि न परे निज हानि, तौ समाज को तजहु न कानि क्यों बिन स्वारथ सहिये खिल्ली, "पंच कहैं बिल्ली तौ बिल्ली"
चूल्हे में हगें शनिचर खां खोर दें !
तात्पर्य - अपना दोष दूसरे पर डालना .
अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम ,
दास मलूका कह गए सब के दाता राम ..
तात्पर्य -  अजगर किसी की नौकरी नहीं करता और पक्षी भी कोई काम नहीं करते भगवान सबका पालन हार है इसलिए कोई काम मात करो भगवान स्वयं ही देगा आलसी लोगों के लिए मलूक दास जी की ये पंक्तियाँ रामबाण है !