Wednesday, December 31, 2008

सबसे सगुन इहे अच्छा...

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सबसे सगुन इहे अच्छा
नया साल आ रहा है और हम अपनी सारी परम्पराओं के साथ समय की यात्रा के अगले चरण में प्रवेश करने जा रहे हैं। ऐसे में भोजपुरी अंचल से एक कहावत जो यात्रा के शगुन की पहचान करती है।
सबसे सगुन इहे अच्छा, सनमुख गाय पिआवे बाछा।
(सगुन- संकेत, सनमुख- सामने, बाछा-बछिया, गाय की संतान)
अर्थात् यात्रा पर निकलते वक्त यदि अपने बच्चे को दूध पिलाती गाय दिख जाए तो यात्रा का उद्देश्य पूर्ण या सफल होता है। नव वर्ष में आपकी भी यात्रा सफल हो। शुभकामनाएं।

Saturday, December 20, 2008

अपनी दही खट्टी नहीं

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इस बार भोजपुरी अंचल से एक और व्यावहारिक कहावत:-
"अपना दही के अहीर खट्टा ना कहे।"
अहीर - दूध/दही वाला,
यानी, दही चाहे लाख बुरी हो, यह जानते हुए भी दही वाला उसे खट्टा नहीं बताएगा, बल्कि वो उसकी तारीफ ही करेगा। क्या यह कहावत अपने एक पड़ोसी देश पर भी खरी नहीं उतरती!

एक और bihari कहावत

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ये कहावत भी माँ से सुना था बचपन में। अब वो तो रही नही इस दुनिया में , तो आप लोगो से उनके मध्यम से bihari कहावते बाच रही हू
"माँ करे कुत्व्नी -पिस्वानी , बेटा दूर्गा दास"


कहानी ज्तनी मुझे याद है - एक लड़का था ,जीसकी माँ गरीब थी और लोगो के घर जा-जा कर मसाले कुटा -पीसा करती थी.पर वो लड़का हमेशा फुटानी (स्टाइल) में रहा करता था । तो लोगो ने उसका मजाक उड़ने के लीये ये कहावत कहना शुरु कर दीया .

Friday, December 19, 2008

एक bihari कहावत

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खेत खाए गधा , मार खाए जूल्हा।
मतलब की गलती कोई और करे और भरे कोई और।

Monday, December 15, 2008

बंगला कहावत

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जोले चान ओ कोरबो , किंतु टिकी भिजेबो ना।
यानि पानी में नाहुगा पर सर नही गिला करू गा । ये प्राय तब कहा जाता है जब कोई आदमी कुछ लाभ पाना चाहता है पर उसके कारण चर्चा में नही आना चाहता है.जैसे प्रेम तो करेगे पर बदनामी नही लेगे .
जोले - पानी ,चान- नहाना , टीकी - चुटिया

Thursday, December 11, 2008

कानी बिनल रहलो न जाए

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"कानी बिनल रहलो न जाए , कानी बिनल नैनों जुडाये।"
बिहार की ये कहावत मैंने मेरी माँ से बचपन में सुनी थी। माँ ने बताया था कि एक आदमी था जिसकी बीवी कानी थी । वो उसे पसंद नही करता था , एक दिन उसने अपनी माँ को कहा की कानी को उसके मायके भेज दो.माँ ने बेटे की बात मान ली और बहु को मायके भेज दिया.कुछ दिन बाद बेटे ने माँ से कहा - माँ मेरा मन नही लग रहा , तुम कानी को वापस बुला लो। तब माँ ने कहा -तुम उसके साथ रह भी नही सकते , उसके बगैर भी नही रह सकते.

kani

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Thursday, November 27, 2008

नसे, उपासे, मांसे, तीनों सर्दी नाशै।

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नसे, उपासे, मांसे, तीनों सर्दी नाशै।
नसे- नशा, उपासे-उपवास, मांसे- मांसाहार, नाशै- नाश करने वाला.
इस बार भोजपुरी अंचल से चुन कर लाया हूँ वो कहावत जो इस मौसम पर काफी सटीक बैठती है।
नसे, उपासे, मांसे, तीनों सर्दी नाशै।
अर्थात् नशा, उपवास और मांसाहार ये तीन सर्दी से लड़ने में सहायक सिद्ध होते हैं। अब इस कहावत में कितनी सच्चाई है यह तो आजमाने वाले ही बता सकते हैं, मगर कही-न-कहीं के अनुभवों की झलक तो इसमें है ही।

Tuesday, November 18, 2008

जाका पड्या स्‍वभाव

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जाका पड़्या स्‍वभाव जासी जीव सूं
नीम न मीठो होयसी
सींचो गुड़ घी सूं


जासी : जाएगा
जीव- शरीर
जाका: जिसका
होयसी : होगा

जिसका जैसा स्‍वभाव पड़ा हुआ है वह अंत तक वैसा ही रहेगा। भले ही नीम को गुड़ और घी से ही क्‍यों न सींच दिया जाए उसमें मीठे फल नहीं निकल सकते। हिन्‍दी में इसके लिए कहा जाता है कि मिट्टी का रंग कभी बदलता नहीं है। इसी तरह और भी कई कहावतें लोगों के न बदलने वाले स्‍वभाव को लेकर कही गई है। यह रंग राजस्‍थान का है। अन्‍य अंचलों में भी इसके लिए कहावतें होंगी।

मेढ़ा जब पीछे हटे

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मेढ़ा जब पीछे हटे, वो ना रहे छपकन्त,
बैरी जब हँस के बोले, तब संभारो कंत।
(मेढ़ा= सिंग वाली भेड़, छोटा भैंसा या साँढ, छपकन्त-बिना मारे नहीं रहने वाला, बैरी- शत्रु)
भोजपुरी के सहज, सरल और व्यावहारिक अनुभवों के पिटारे से इस बार यह कहावत, जिसमें व्यक्ति का बाह्य आचरण देख उसकी नियत को भांप लेने का संदेश छुपा है।
इसका तात्पर्य है की यदि किसी व्यक्ति को देख साँढ अपने स्वाभाव के विपरीत पीछे हटे तो इससे समझ लें की वह अब वार करने ही वाला है। इसी प्रकार यदि कोई शत्रु आपसे मीठी जुबान में बात करता हुआ अपनी शत्रुता से पीछे हटने का भ्रम दे तो सावधान हो जायेंया संभल जायें क्योंकि वो किसी नए प्रहार की योजना बना रहा है।
निश्चित ही इतनी गूढ़ बातको कितनी सरलता से कह दिया गया है इस कहावत में।

Monday, November 10, 2008

कर में लागल आग ?

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भोजपुरी जितनी मीठी भाषा है उतनी ही मीठी हैं इसकी कहावतें; जिनसे यहाँ के ग्राम्य जीवन के अनुभव झलक पड़ते हैं. ऐसी ही एक कहावत है - "घर के मारल बन में गइली, बन में लागल आग। बन बेचारा का करे कि कर में लागल आग ?"
अर्थात यदि तकदीर ही अपने पक्ष में न हो (हाथों की लकीरें) तो आदमी चाहे घर में रहे या वन में परेशानियाँ पीछा करती ही रहती हैं. इसी की एक समानार्थक कहावत है- " जाओ चाहे नेपाल, साथ जायेगा कपाल". यानि- चाहे कहीं भी जाओ आपकी किस्मत आपका साथ नही छोड़ने वाली.

Wednesday, November 5, 2008

उत्तम बुद्धि बाणिया

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उत्तम बुद्धि बाणिया
पच्‍छम बुद्धि जाट
बामण सपम्‍मपाट

सबसे अधिक अक्‍ल बणिए में होती है, सबसे कम जाट में और ब्राह्मण दिमाग से सपाट होता है। यहां अक्‍ल लगाने के हिसाब से वर्गीकरण किया गया है। वणिक काफी आगा पीछा सोचकर काम करता है और काफी अधिक सही निर्णय लेता है। जाट या किसान आगा पीछा सोचे बिना निर्णय ले लेता है। और बामण यानि ब्राह्मण सोचता ही नहीं है।

आमतौर पर यह कहावत ब्राह्मण परिवारों में कही जाती है। इसका इस्‍तेमाल तब होता है जब कोई व्‍यक्ति निर्णय लेकर भी उस निर्णय के बारे में कोई स्‍पष्‍ट जस्टिफिकेशन नहीं दे पाता है।

Monday, October 20, 2008

खसम को रोटी तुम पै देओ

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बातें-चीतें हमसे लेओ,
खसम को रोटी तुम पै देओ।
===============================
खसम = पति
पै = बनाना
बातें-चीतें = बातचीत, गपशप
===================================
बुंदेलखंड में ये कहावत ऐसे लोगों के लिए प्रयुक्त होती है जो काम की अपेक्षा बातों में अपना अधिक समय लगाते हैं.

Sunday, October 12, 2008

स्वर्गीया भारती सराफ: जन्म दिवस १४ अक्टूबर पर श्रद्धांजलियां

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" भारती सराफ " उभरती नृत्य साधिका " जो शरदोत्सव की शुरुआत करतीं थी : इस बार उनके बिना होगी शुरुआत"
वे कम उम्र में जबलपुर की सर्वाधिक
" कोरीओग्राफ़र '" थीं ........

Sunday, October 5, 2008

रोई रो फूल

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रूप रूड़ो गुण बाइड़ो
रूईड़े रो फूल


रूड़ो : सुन्दर
बाइड़ो: कड़वा या असुंदर
रूइड़ो : जंगल

जंगल में खिलने वाला फूल सुंदर तो होता है लेकिन उसमें खुशबू या अन्य कोई गुण नहीं होता।

इसके लिए उदाहरण ले सकते हैं कि बिना पढ़ा लिखा सुंदर आदमी, बिना एटीट्यूड की खूबसूरत महिला, यानि सहयोगी गुण के बिना किसी एक गुण का विकसित होना। ऐसे नितांत गुण का कोई उपयोग नहीं होता।

(यह कहावत मेरी नानी ने मुझे बताई है।)

Monday, September 29, 2008

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1:
//अम्मा कहेली बेटी नीति उठी आइयह
पापा कहले छौ मास आइयह
भइया कहेले बहिना काजपरोजन
भाभी कहेली जनि आव तुहै//

(मायने- शादी के बाद बेटी को मां कहती है बेटी रोज-रोज आ जाना, पिता कहते हैं छे महीने पर आना, भाई कहते हैं बहन कभी कोई मौका-तीज-त्यौहार पड़े तब आना, भाभी कहती है तुम मत आना,ये शादी के बाद बेटी के प्रति मां का प्यार बताता है। )

2:
//बेटा
मचिया बैठल रउरा अम्मा हे बड़इतीन
जैसन बूझिय आपन धियवा
वैसन बूझियह हे हमरो तिरियवा
मां
-
पुरुब के चांद पश्चिम चली जाइयह
धिया के दुलार पतोह नहीं पाइहें

बहू
-उड़िया के पानी बरेरी चली जाइहें
अवध सिंघोड़वा ननद नहीं पाइहें//

(मायने-शादी के बाद बेटा अपनी पत्नी को लेकर आया है, मां चारपाई पर बैठी है
बेटा- मां जैसे तुम अपनी बेटी को मानती थी उसी तरह मेरी पत्नी को दुलार देना
मां- पूरब का चांद पश्चिम चला जाएगा, मगर बेटी जैसा दुलार बहू नहीं पा सकती
बहू-पानी बहने की जगह उड़कर आसमान की ओर जाने लगेगा लेकिन अब इस घर से ननद को कुछ नहीं मिलेगा )
(शब्द
मचिया-चारपाई, धिया-बेटी, तिरिया-पत्नी, पतोह-बहू, उड़िया-उड़ना, अवध का मतलब अयोध्या से है, सिंघोड़ा सिंदूर रखने का एक छोटा संदूक नुमा होता है, अवध और सिंघोड़वा को प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है)


पूर्वांचल के ये दोनों ही लोकोक्तियां बेटी और बहू को लेकर बुनी गई हैं। तब के समाज की सोच-संस्कृति, मां की ममता, बेटी और बहू के बीच भेदभाव, इन मुहावरों में सबकुछ है। ये मैंने अपनी मां से फोन पर पूछ कर लिखा है। क्योंकि बातों-बातों में वो बहुत कुछ ऐसा बोल जाती थी, जिसे हम तब समझ नहीं पाते थे। मैंने उनसे ऐसे और भी मुहावरों-लोकोक्तियों-गीतों को अपनी याददाश्त से बाहर खींचने को बोला है। फिलहाल तो यही।

Tuesday, September 23, 2008

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मां-मौसी वैसे तो बातों-बातों में कई मुहावरें बोल जाती हैं, कुछ उनकी यादों के पिटारे में से।

//लड़का भीर त जाइब ना
जवनका है भाई
बुढ़ऊ के त छोड़ब न
कितनो ओढ़ियें रजाई

ये जाड़े की धमकी है संभल जाने के लिए
मायने- बच्चे के पास आया तो जाऊंगा नहीं, जवान लोग तो अपने दोस्त की तरह हैं, क्योंकि उनपर ठंड का कोई असर होता नहीं और बूढ़ों को तो किसी सूरत में नहीं छोड़ूंगा चाहे कितनी ही रजाई ओढ़ लें, बूढ़ों को ठंड जल्दी लगती है//

//चोर चाहे हीरे क या खीरे का चोर, चोर ही होता है

नसीहत-चोरी चाहे छोटी हो या बड़ी, वो चोरी ही कहलाती है।//

//आनर गुरू बहिर चेला
मांगे गुड़ देवे ढेला

मायने- अंधा गुरू, बहरा चेला, गुड़ मांगा और दिया पत्थर। ये मूर्खता पर किया गया व्यंग है। //


Thursday, September 18, 2008

एक टिप्पणी इधर भी

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चिट्ठा चर्चा, में स्वर्गीय-श्री प्रह्लाद नारायण मित्तल से मुलाक़ात कीजिए,
उड़न तश्तरी ब्लॉग-"आलसी काया पर कुतर्कों की रजाई" डाल कर गज़ब तीर चला दिया
मुझको नहीं पता कविता क्या हैं फ़िर भी लिखे जा रहे हैं उधर लोग बाग़ एक परम स्वादिष्ट कविता , परोसे जा रहें हैं साक़ी शराब दे दे .----कुछ लोग ये गा-गा कर दिन को नशीला बनाने आमादा हैं.बेट्टा, ब्लागिंग छोड़ो ,मौज से रहो, अब भैया का नारा देकर पंडित जी ने गज़ब ढा दिया आँख की किरकिरी-की ताज़ा पोस्ट की "ईश्वर धर्म और आस्था के सहारे मृत्यु का इंतज़ार ही क्या हमारे बुज़ुर्गों के लिए बच गया काम है ?" की इस पंक्ति ने आंख्ने भिगो दीं .शीतल राजपूत के चिट्ठे का स्वागत ज़रूरी है,कुछ दिनों से ब्लॉगन-ब्लागन वार देख के मन खट्टा तो हुआ था किंतु जब ये मारें लातई-लात कहावत देखी तो लगा शायद कोई रास्ता काढ़ लिया जाएगा
माँ कविता प्रति इसे मेरा आभार मानिए .
तैयार रहिये अपने ब्लॉग पर टिप्पणियों की बरसात के लिए , बांचते ही अपन की बांछें खिल गई अपन भी टिप्पणी पाने की दावेदारी बनाम लालच से भरा ब्लागिया दिल लेकर आज की पोस्ट लिख रहें हैं

Tuesday, September 16, 2008

घर कुलिया में

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शान बड़ी,
घर कुलिया में।
==============
कुलिया = छोटी सी गली
==============
ये कहावत का एक छोटा सा हिस्सा है। इसका अर्थ है कि शान या दिखावा तो बहुत किया जाता है पर असलियत में कुछ भी नहीं होता है।
ये कहावत ऐसे लोगों के लिए बनी है जो अकारण अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने में लगे रहते हैं।

Thursday, September 11, 2008

अंड को मूसरो

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अक्सर देखा जाता है कि किसी काम के लिए कुछ विशेष या निश्चित लोगों की जरूरत होती है और कुछ बिना कारण बीच में हस्तक्षेप किया करते हैं ऐसे लोगों को किसी तरह का कोई लाभ भी नहीं मिलता है और सामाजिक स्थिति भी ख़राब हो जाती है. ऐसे ही लोगों को ध्यान में रख कर ये कहावत बनी होगी-

राजा को दूसरो,
अंड को मूसरो और
बकरिया को तीसरो,
परेशान होते है।

======================

अंड = एक लकडी जो एकदम खोखली होती है।

मूसरो = मूसल, जिससे कुटाई की जाती है।

बकरिया = बकरी

=======================

इसका अर्थ है कि यदि राजा के दो लड़के हैं तो दूसरे को लाभ नहीं होता है क्योंकि राज्य परम्परा के अनुसार बड़े को मिलता है यानी पहले को. इसी तरह अंड की लकडी इतनी खोखली होती है कि यदि उसका मूसल बना लिया जाए तो भी उससे किसी तरह की कुटाई नहीं की जा सकती है. कुछ इसी तरह का हाल बकरी के तीसरे बच्चे का होता है. चूँकि बकरी के दो थन होते हैं और यदि उसके एक साथ तीन बच्चे हो जाते हैं तो तीसरे को हमेशा थन से दूध पीने में दिक्कत आती रहती है.

Friday, August 29, 2008

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हूं राणी तूं राणी
कूण घालै चूले मैं पाणी


हूं- मैं
राणी- रानी
कूण- कौन
घालै- डाले
चलै- चूल्‍हा
पाणी- पानी

एक रानी दूसरी से कहती है मैं भी रानी हूं और तूं भी रानी है तो चूल्‍हे में भात बनाने के लिए कौन पानी डालेगा। यानि कोई नहीं डालेगा। इस तरह काम होगा ही नहीं।

रानियों की बात:
इस कहावत से मुझे एक बात याद आ गई। मेरे एक मामाजी हैं एक दिन उन्‍होंने मुझे मेहतरानी की इंसल्‍ट करते हुए देख लिया। तो उस समय तो कुछ नहीं बोले लेकिन बाद में मुझे बैठाकर समझाया कि एक राजा (गृहस्‍वामी) के चार रानियां होती है। महारानी, पटरानी, नौकरानी और मेहतरानी। चारों रानियों का अपना महत्‍व और काम है। कभी इनकी इंसल्‍ट नहीं करनी चाहिए। अब एक ऐसी कॉलोनी में रहता हूं जहां नगर परिषद के कर्मचारी सफाई नहीं करते। ऐसे में मेहतरानी की भूमिका अधिक प्रबल हो जाती है। इस कहावत में मेहतरानी तो नहीं है लेकिन एक ही राजा की दो रानियों के बारे में है सो यह बात याद आ गई सो ठेल दी। उम्‍मीद है कहावत की तरह लोकभाव की यह बात भी आपको पसंद आएगी।

Tuesday, August 19, 2008

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ग्‍यानी काढ़े ग्‍यान सूं
मूरख काढ़ रोय


ग्‍यानी: ज्ञानी
काढ़े: गुजारता है

यानि ज्ञानवान मनुष्‍य ज्ञान के भरोसे मुश्किल दिनों को गुजारता है और मूरख व्‍यक्ति खराब दिनों में कुछ करने के बजाय केवल रोता रहता है। डॉ कुमारेन्‍द्र की कहावत से मुझे यह पुरानी कहावत याद आई। छोटा था तब मेरी मां मुझे रोता देखकर यह कहावत कहती थी। हालांकि बच्‍चे के रोने से इस कहावत का कोई लेन-देन नहीं है लेकिन चूंकि मुझे ज्ञानी बनने का भूत सवार था (जो आज भी है) इसलिए मैं रोते- रोते चुप हो जाता है और मां मुस्‍कुराकर अपना काम करने लगतीं।

माताजी के मटके

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माताजी गढ़ में बैठी मटका करै
बाणिए ने बेटो देर देख

मटका: हंसी ठिठोली
देर: देकर

यह कहावत है लोक देवता भैरवजी और देवी मां के संवाद की। कहानी कुछ यूं है कि एक बार एक बणिए के कोई संतान नहीं होती। वह सभी देवी देवताओं से मनौतियां मांग लेता है। पत्‍थर-पत्‍थर पूजने वाला बणिया आखिर में हताश होकर जंगल के किनारे बने एक भैरूं जी के पास जाता है। वहां खड़ा एक आदमी बणिए को देखकर सोचता है कि बणिया फोकट में भैरूंजी से आशीर्वाद न ले ले। वह बणिए को सचेत करता है कि अगर मन्‍नत पूरी हुई तो यहां पाडा (भैंस का बच्‍चा) चढ़ाना पड़ेगा। बणिया संकल्‍प कर लेता है। भैरूंजी की कृपा होती है और सालभर के अन्‍दर ही बणिए के बेटा हो जाता है। बणिया जबान का पक्‍का होता है। वह भैंस का पाडा लेकर भैरूंजी के मंदिर पहुंच जाता है। जैसे ही पाडे की गर्दन काटने को उदयत होता है तो बणिए के हाथ कांप जाते हैं। कई देर के मानसिक द्वंद्व के बाद बणिया यह कहकर भैरूंजी के पत्‍थर के साथ डोरी से पाडे को बांध देता है कि तेरा पाडा तूं जाने। पाडा कई देर तक भैरूंजी से बंधा खड़ा रहता है। इसके बाद जोर लगाकर भैरूंजी को धरती से बाहर खींच लेता है। अब पाडा दौड़ता जाता है और भैरूंजी उसके पीछे। इस तरह भैरूंजी घिसटते हुए गढ़ के आगे से निकलते हैं। गढ़ में बने मंदिर में माताजी भैंरूजी को देखती है तो हंसने लगती हैं। तो भैंरूजी चिढ़कर कहते हैं। माताजी गढ़ में बैठ मटका करो, बाणिए नै बेटो देर देखो।
इस कहानी को भस्‍मासुर की कहानी से भी जोड़ा जा सकता है लेकिन इस कहावत में गलत व्‍यक्ति के प्रति की गई दया और सहायता करने का दर्द शिद्दत से महसूस होता है।

मारें लातई-लात

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ग्यानी तें ग्यानी मिलें,
करें ज्ञान की बात।
गधा से गधा मिलें,
मारें लातई-लात।
============================================
कहावत है की जब ज्ञानी व्यक्ति(बुद्धिमान) किसी दूसरे ज्ञानी व्यक्ति से मिलता है तो वे आपस में ज्ञान की बातें, भली बातें करते हैं और जब दो मूरख आपस में मिलते हैं तो उनमें विवाद होने के और कुछ नहीं होता है.

Thursday, August 14, 2008

सलाम प्रणाम में क्या फर्क करिए

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माँ....तुझे प्रणाम...माँ तुझे सलाम
न सिर्फ प्रणाम न सिर्फ सलाम
सच

६१ बरस की आज़ादी और हम
कितने संवेदन हीन से हैं
मै तुम् ये वो
मिल कर "हम" न हो सके तो
सच हम मादरे-वतन के वफादार बच्चे नहीं
फिर भी कोशिश जारी रहे
वन्दे मातरम

Thursday, August 7, 2008

हाथ में खुरपी, बगल में चारा

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ससुरार सुख की सार,

जो रहे दिना दो-चार।

जो रहे दिना दस-बारा,

हाथ में खुरपी, बगल में चारा।

========================================

ससुरार = ससुराल

दिना = दिन

बारा = बारह

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इस कहावत का तात्पर्य है कि जिस जगह आपकी इज्ज़त बहुत अधिक होती हो (उदहारण के लिए ससुराल) वहां एक समय सीमा से अधिक नहीं रुकना चाहिए. इससे इज्ज़त कम होती है और फ़िर उसे भी रोज़मर्रा के काम करने पड़ सकते हैं.

Monday, August 4, 2008

कुंभार री बेटी काकोसा नौ...

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कुंभार री बेटी, काकोसा नौं,
चढ़ बैठी किल्‍ले ऊपर, लूट लाई गौं।

भावार्थ: कुंभार री – कुम्‍हार की, नौं- नाम, किल्‍ले- किला, गौं- गांव

इस्‍तेमाल: छोटा आदमी बड़े ओहदे पर बैठकर बड़ों के बोल बोलने लगता है तो व्‍यंग में उसे ऐसी उक्ति कही जाती है।

कहानी:
कुम्‍हार की अल्‍हड़ बेटी ‘काकोसा’ एक दिन दूसरे बच्‍चों के साथ खेलते-खेलते किले में चली जाती है। सैनिक बच्‍चों का खेल देखकर उन्‍हें टोकते नहीं है। काकोसा किले की प्राचीर पर चढ़ जाती है। किले की आबोहवा का ऐसा असर होता है कि वह वहीं से दुश्‍मन को ललकारने लगती है। तो वहां खड़ा राजपुरोहित हंसते हुए यह बात कहता है।

Sunday, August 3, 2008

गाडे में छाजले रो भार

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भावार्थ: गाडा – ठेला, छाजले- कचरा उठाने के‍लिए लोहे की बनी छाज, भार- वजन

इस्‍तेमाल:
बड़े प्रयास में छोटा प्रयास और जुड़ने से काम की गति और सामर्थ्‍य पर प्रभाव नहीं पड़ता।

कहानी:
कचरा एकत्र करने वाला व्‍यक्ति जब कचरे से भरी गाड़ी को खींच रहा था तो उसकी पत्‍नी ने पूछा कि क्‍या वह अपना ‘छाजला’ उसके ठेले में रख दे तो व्‍यक्ति ने कहा कि ‘रख दे, प्‍यारी, गाडे में छाजले रो क्‍या भार?’

Sunday, July 27, 2008

सरगे को जाए

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दादा मीठे, ददिया मीठी,


सरगे को जाए?


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सरगे = स्वर्ग


इस कहावत का अर्थ इस रूप में है कि काम भी हो जाए और प्रयास भी न करना पड़े. उदहारण के लिए यदि किसी को अपनी सेहत बनानी हो और वो सुबह जल्दी जाग कर कसरत करना या घूमना भी नहीं चाह रहा तो यही कहा जाएगा.

Friday, July 25, 2008

इनसें गंगा हारी

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छिनरा, चोर, जुआरी,

इनसें गंगा हारी.

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छिनरा = व्यभिचारी पुरूष

कहा गया है कि व्याभिचारी पुरूष से, चोर से और जुआ खेलने वाले का सुधार बहुत मुश्किल है, इनको सुधार न पाने के कारण ही कहा गया कि गंगा जैसी पावन नदी भी इन्हें पवित्र नहीं कर सकती.

Thursday, July 24, 2008

इन्हें कबहूँ न मारिये

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बहु-ऋणी, बहु-धन्धीय,

बहु-बेटियाँ को बाप।

इन्हें कबहूँ न मारिये,

जे मर जैहें अपने आप॥

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पुराने समय से लोक-नीतिगत कहावत के रूप में प्रचलित है कि जो व्यक्ति बहुत अधिक क़र्ज़ में डूबा हो, जो बहुत सारे कामों को एक साथ करता हो और जो बेटों की चाह में बहुत अधिक बेटियों को जन्म दे चुका है, ऐसे व्यक्ति के सामने आफत-मुसीबतें आती ही रहती हैं. इस वजह से इन्हें परेशान नहीं करना चाहिए ये तो अपने कारनामों से ख़ुद ही परेशां रहते हैं.

Monday, July 21, 2008

फूहर का कमाल

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फूहर चाले,

सब घर हाले

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फूहर = फूहड़ (इसका तात्पर्य यहाँ ऐसे व्यक्ति से है जो बिना सोचे समझे काम करता है)

चाले = चलना

हाले = हिलना

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अर्थात ऐसे व्यक्ति के कारनामों से पूरा घर परेशां होता है जो बिना सोचे समझे काम करता है। इन कामों में बुरे काम भी शामिल किए जा सकते हैं।

Friday, July 18, 2008

आब-आब कह पुतुआ मर गए

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फारस गए, फारसी पढ़ आए,
बोले पी की बानी।
आब-आब कह पुतुआ मर गए,
खटिया तरे धरो रहो पानी।

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बानी=बोली
आब=पानी
पुतुआ=किसी लड़के का संबोधन
तरे=नीचे
धरो=रखा
========================================
इसका अर्थ ये है कि किसी व्यक्ति को फारसी का ज्ञान हो गया. अपने गाँव में इस भाषा से अनजान लोगों के बीच वह बीमारी में आब-आब चिल्लाता रहा. कोई जान न पाया की वह पानी मांग रहा है और उसने दम तोड़ दिया, जबकि पानी उसकी चारपाई के पास ही रखा था.
=====================================================
मतलब बिना आवश्यकता के रोब दिखने के लिए अपनी योग्यता का बखान नहीं करना चाहिए।

Wednesday, July 16, 2008

जासे अच्छे अपने ठनठन गोपाल

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कंडा बीने लक्ष्मी,

हर जोतें धनपाल।

अमर हते ते मर गए,

जासे अच्छे अपने ठन-ठन गोपाल॥

========================

हर जोतें = खेत जोतना

हते = थे

जासे = इससे

=======================

इसका अर्थ ये है कि नाम को लेकर जो समस्या हुई (ठन-ठन गोपाल नाम पर), नाम से खफा व्यक्ति जब बाहर निकलता है और देखता है कि लक्ष्मी नाम की महिला कंडे बीन रही है, धनपाल नाम का व्यक्ति खेत में काम कर रहा है और जिसका नाम अमर था वो मर गया है तो इससे अच्छा अपना ठनठन गोपाल नाम ही भला है.

वाईस ऑफ़ इंडिया:02

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http://voi-2.blogspot.com/वाइस-ऑफ़-इंडिया-"द्वितीय"

Monday, July 14, 2008

कानी अपनों टेंट न निहारे

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कानी अपनों टेंट न निहारे,

दूजे को पर-पर झांके।

टेंट=दोष

निहारे=देखना

दूजे=दूसरे को

पर-पर=लेट-लेट कर

झांके=देखना

कहा जाता है कि दोषी या ग़लती करने वाला अपने दोष या अपनी ग़लती पर ध्यान नहीं देता है पर दूसरे के दोषों या ग़लती को बताने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है.

Thursday, June 19, 2008

वाह रे म्‍हारा घर रा धणी

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वाह रे म्‍हारा घर रा धणी
मारी थोड़ी घीसी घणी


म्‍हारा: मेरे
धणी: मालिक
घीसी: घसीटा
घणी: ज्‍यादा

यहां पत्‍नी अपने पति पर व्‍यंग करती है कि जिस बात पर लड़ाई हुई है उसके लिए मुझे मारा तो कम लेकिन बाजार में ले जाकर घसीटा अधिक। यानि चोट कम की और मानहानि अधिक। ऐसा उलाहना आमतौर पर छोटी सी बात का बतंगड़ बनाने वाले व्‍यक्ति को दिया जाता है।

जाट, जमाई भाणजा रेबारी सोनार:::

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जाट जमाई भाणजा रेबारी सोनार
कदैई ना होसी आपरा कर देखो उपकार


जाट : यहां प्रयोग तो जाति विशेष के लिए हुआ है लेकिन मैं किसी जाति पर टिप्‍पणी नहीं करना चाह रहा। उम्‍मीद करता हूं कि इसे सहज भाव से लिया जाएगा।

जमाई: दामाद

भाणजा: भानजा

रेबारी सोनार: सुनारों की एक विशेष जाति


इसका अर्थ यूं है कि जाट जमाई भानजे और सुनार के साथ कितना ही उपकार क्‍यों न कर लिया जाए वे कभी अपने नहीं हो सकते। जाट के बारे में कहा जाता है कि वह किए गए उपकार पर पानी फेर देता है, जमाई कभी संतुष्‍ट नहीं होता, भाणजा प्‍यार लूटकर ले जाता है लेकिन कभी मुड़कर मामा को नहीं संभालता और सुनार समय आने पर सोने का काटा काटने से नहीं चूकता।

यह कहावत भी मेरे एक मामा ने ही सुनाई। कई बार

बुन्देली कहावत-01

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जबरा मारै रोय न दे
जबरा=ज़ोर ज़बरदस्ती कराने वाला
"किसी को भी ऐसी प्रताड़ना देना जिससे रोने को जी चाहे किंतु मारने वाला रोने भी नहीं देता !"

Friday, June 6, 2008

कुछ- कुछ ऐसा होता होगा गांव

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Sunday, June 1, 2008

नर्मदांचल,बुन्देली, की लोकोक्तियाँ:-01

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  • नर्मदांचल
    हरदा,टिमरनी, क्षेत्र में मुझे जो लोकोक्ति सबसे पसंद आई :"बोर पकी रीछडी का डोला आया"
    बोर:बेर,
    रीछडी: मादा-रीछ,
    डोला:आँखें
    जब बेर पकी तो मादारीछ आंखों मे कन्जक्टिवाईटिस हुआ यानी सही अवसर को खो देना

  • बुन्देली:"मरी जान मल्हारी गावे" मरी-जान: कमजोर शरीर वाला,/वाली, मल्हारी:-राग मल्हार शख्शियत के अनुकूल काम न करना,इसे यह भी कहा जा सकता है सीमोल्घंन करना

Saturday, May 31, 2008

माथै में दी

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माथै में दी
गांड भड़ाभड़ बोले


माथै : सिर
गांड़: गुदा
भड़ाभड़: विशेष तरह की आवाज

आमतौर पर कड़के आदमी के लिए इस प्रकार का विशेषण काम में लिया जाता है। जिस आदमी के पास अपनी बात कहने के पीछे ठोस आधार नहीं होता उसे भी यह बात कही जाती है।
दृश्य (विजुअलाइजेशन) : किसी व्यक्ति के सिर में डंडा मार रहे हैं और धड़ वाला भाग पाइप की तरह पूरा खाली होने के कारण पिछवाड़े से डण्डे की गूंज सुनाई दे रही है।
यह व्यंग और दुत्कार में काम में लिया जाता है।

नंगन की गड़ई भई

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नंगन की गड़ई भई,
बार बार हगन गई।



गड़ई का अर्थ है, लोटा जो कि एक धातुपात्र होता है

एक गॉंव के दरिद्र व्‍यक्ति, जिसके पास कुछ भी नहीं होता है, को अचानक एक
मिटृटी का पात्र मिल जाता है। अब चूँकि वह व्‍यक्ति तो दरिद्रता की वज़ह
से ही प्रसिद्ध था, अत: व़ह परेशानी में था कि अब कैसे गॉंव के लोगों को
यह पात्र दिखाकर अपनी धाक जमावे। तो वह बार-बार पात्र में जल भरकर शौच के
लिए जाता, जिससे लोगों को पता चल जाए कि दरिद्र के पास एक पात्र है।

अर्थात किसी मनुष्‍य के पास जब कोई वस्‍तु आती है, तो वह दुनिया को उस
वस्‍तु को दिखाने के सौ-सौ बहाने ढूँढा करता है। अब देखिए न, वह दरिद्र
व्‍यक्ति जिसके पास खाने-पीने की व्‍यवस्‍था तक नहीं है, वह मिट्टी का
पात्र लेकर बार-बार शौच के लिए जाता है, सिर्फ़ प्रदर्शन के लिए।

यह पोस्‍ट हमारे दोस्‍त अशोक कुमार वर्मा ने मेल से भेजा है। उनके इस सहयोग के लिए हार्दिक आभार। अन्‍य अंचलों के साथियों से भी अनुरोध है कि इस विद्या को बढाने में सहयोग करें।

Sunday, May 18, 2008

बींद रे पडे राळयों...

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बींद रै पडे राळयों तो

जॉनी बिचारा क्‍या करे


बींद: वर
राळयो: लार टकपना
जॉनी: बारात में साथ आए लोग

इसका अर्थ है कि समस्‍या का मुख्‍य किरदार ही लालच में है तो जुडे हुए अन्‍य लोग तो उसका कुछ भी समाधान करने में समर्थ नहीं होंगे।

कहानी इस तरह है कि- वर को लेकर बाराती दुल्‍हन के घर तक जाते हैं। बारात पहुंचती है तो उसका ढंग से स्‍वागत नहीं किया जाता। वधू पक्ष के लोग भी खातिर नहीं करते। व्‍यवस्‍थाएं गडबडाई हुई होती हैं। इस पर लोग वर के पिता से शिकायत करते हैं। वर का पिता इतने खराब व्‍यवहार को देखते हुए शादी तोडने के लिए तैयार हो जाता है लेकिन वर अपनी फियांसी पर लट्टू होता है। न तो शादी टूटती है और न अतिथियों का सत्‍कार होता है। अब रिश्‍तेदार बार-बार वर के पिता के पास शिकायत लेकर आते हैं। तो वर का पिता कहता है बींद रै पडे राळयो तो जॉनी बिचारा क्‍या करे। इस कहावत को अन्‍य प्रकार की समस्‍याओं में भी इस्‍तेमाल किया जाता है बस वर की तरह समस्‍या में मुख्‍य किरदार लालच में फंसा हुआ होना चाहिए।

Friday, May 16, 2008

आप मरियो जुग परलय

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आप मरियो जुग परलय

आप: खुद
मरियो: मरने पर
जुग: सृष्टि
परलय: प्रलय

मेरी मौत आ जाए तो भले ही प्रलय हो जाए। जो लोग यह मानते हैं कि मेरे जिन्‍दा रहने तक ही सृष्टि है उन लोगों का यह भी मामना होता है कि उनके मरने के बाद तो प्रलय हो जाएगी। भले ही प्रलय न हो लेकिन उनके लिए फिर दुनिया का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। आमतौर पर इस कहावत का इस्‍तेमाल वर्तमान की उन समस्‍याओं के लिए किया जाता है जिनका सॉल्‍यूशन दिखाई नहीं दे रहा होता है। वे कहते हैं कि हम तो मर जाएंगे बाद में भले ही इन समस्‍याओं के साथ प्रलय आ जाए।

बिगडे भ्‍यों रो नाई

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बिगडियोडे भ्‍यौं में नाई फिरे ज्‍यां फिरे

बिगडियोडे: बिगडे हुए
भ्‍यौं: विवाह
नाई: शादी में काम करने वाला वह व्‍यक्ति को दो परिवारों के बीच सांमजस्‍य का काम करता है
फिरे: घूम रहा है

नाई दो परिवारों में सामंजस्‍य बिठाकर शादी की स्थिति पैदा करता है। परिवार से बाहर का आदमी होने के बावजूद उसकी पंचायती सबसे ज्‍यादा होती है। लेकिन जब शादी बिगड जाती है तो नाई को कोई नहीं पूछता। वह किंकर्तव्‍यमूढ सा घूमता रहता है। न कोई उसके पास आता है न वह किसी को पास जा पाता है।
जो व्‍यक्ति बिना कारण अनुपयुक्‍त स्‍थान पर विमजिकल सा खडा होता है उसे बिगडे हुए विवाह के नाई की संज्ञा देते हैं।

Thursday, May 8, 2008

ब्‍याह बिगाडे दो जणा, कै मूंझी कै मेह

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कहावत है
ब्‍याह बिगाडे दो जणा, कै मूंझी कै मेह
ब्‍याह शादी
जणा लोग
कै या फिर
मूंझी कंजूस
मेह बारिश
यानी दो लोग शादियां बिगाडते हैं, या तो कंजूस और बारिश।

Wednesday, May 7, 2008

बाबल हो छीछर आळो...

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'बाबल हो छीछर आळो
खसम मिल ग्‍यो घूघर आळो'


बाबल - पिता
छीछर - फटे हुए कपडे
खसम - पति
घूघर - सोने की पगरखी
आळो - वाला

सास बहू की लडाइयां जग प्रसिद्ध हैं। सास काठ की भी हो तो बहू तो सुहाती नहीं है और बहू कुछ भी जतन कर ले सास खुश नहीं होती। ऐसे में पति का प्‍यार पाने वाली ऐसी बहू जिसका पीहर ज्‍यादा पैसे वाला नहीं होता, जब कोई ऊंची बात कह जाती है तो सास ताना देती है कि पिता के घर में तो कुछ देखा नहीं और पति (उसका बेटा) बहू को अच्‍छा मिला गया।

Tuesday, May 6, 2008

फूहड घर में लगी किंवाडी...

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"फूहड घर में लगी किंवाडी

सगळा कुत्ता चल्‍या रेवाडी

बूढे कुत्ते लियो सुण

लगाई तो है पर ढकसी कूण"



किंवाडी - जाली का दरवाजा जो मुख्‍यद्वार से आगे होता है
सगळा - सभी
सुण - सुनना
ढकसी - बंद करना
कूण - कौन

यह कहावत है फूहड लोगों के लिए कि वे कोई भी व्‍यवस्‍था क्‍यों न कर लें जब तक सिस्‍टम के लोग सक्रिय नहीं होंगे तब तक व्‍यवस्‍था सुचारू नहीं हो सकती।

कहानी यह है कि एक बडा घर था, उसमें काफी लोग रहते थे लेकिन कोई भी अपनी जिम्‍मेदारी नहीं समझता था, सब अपने में मस्‍त रहते। इसका फायदा गली के कुत्ते उठाते और जब-तब घर में घुस जाते थे। घर के मालिक से इस समस्‍या के समाधान के लिए एक रास्‍ता निकाला कि घर के मुख्‍य द्वार के आगे लकडी का जालीदार छोटा गेट लगा दिया। कुत्तों ने सोचा कि अब हमारी दाल यहां नहीं गलेगी तो वे वहां से रवाना हो गए। कुत्तों में एक सयाना बुढ्ढा कुत्ता था उसने जब यह बात सुनी तो हंसा। बोला किंवाडी लगाने से कुछ नहीं होता इसे ढकना भी पडता है। जैसे मुख्‍य द्वार खुला रहता है वैसे ही किंवाडी भी खुली रहेगी। बूढे कुत्ते की बात सुनकर बाकी कुत्तों की जान में जान आई। इसके बाद सभी कुत्ते सुख से वहीं रहने लगे और घ्‍ार के अन्‍दर और बाहर आते-जाते रहे।

Sunday, May 4, 2008

शुरु होता है कहावतों का सफर

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यह ब्लॉग समर्पित है लोक अंचल की ऐसी कहावतों को जो क्षेत्र विशेष में तो बहुत बोली जाती है लेकिन किन्हीं कारणों से कभी प्रिंट नहीं होती। कहावतों की मिठास, चुभन और मिट्टी की खुशबू की बानगी देखने को मिलेगी इस उम्मीद के साथ हम यह ब्लॉग शुरु कर रहे हैं।
 

मेरे अंचल की कहावतें © 2010

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