Tuesday, August 19, 2008

ग्‍यानी काढ़े ग्‍यान सूं
मूरख काढ़ रोय


ग्‍यानी: ज्ञानी
काढ़े: गुजारता है

यानि ज्ञानवान मनुष्‍य ज्ञान के भरोसे मुश्किल दिनों को गुजारता है और मूरख व्‍यक्ति खराब दिनों में कुछ करने के बजाय केवल रोता रहता है। डॉ कुमारेन्‍द्र की कहावत से मुझे यह पुरानी कहावत याद आई। छोटा था तब मेरी मां मुझे रोता देखकर यह कहावत कहती थी। हालांकि बच्‍चे के रोने से इस कहावत का कोई लेन-देन नहीं है लेकिन चूंकि मुझे ज्ञानी बनने का भूत सवार था (जो आज भी है) इसलिए मैं रोते- रोते चुप हो जाता है और मां मुस्‍कुराकर अपना काम करने लगतीं।

2 विचार आए:

Kheteshwar Borawat, B.tech, SASTRA UNIVERSITY said...

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की ढेरों शुभकामनाएं |


हिन्दी में लिखने की लिए पर जायें

http://hindiinternet.blogspot.com/

रचना गौड़ ’भारती’ said...

युक्ति सही है। एक नया प्रयोग है। बधाई!

 

मेरे अंचल की कहावतें © 2010

Blogger Templates by Splashy Templates