शुक्रवार, ६ नवम्बर २००९

ओछे की प्रीत, बालू की भीत

ओछे की प्रीत,

बालू की भीत


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ओछे - गिरा हुआ
भीत - दीवार

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भावार्थ - इसका अर्थ इस रूप में लगाया जा सकता है कि जैसे बालू की दीवार मजबूत नहीं होती, कभी भी गिर सकती है उसी तरह किसी भी रूप से गिरे हुए व्यक्ति की दोस्ती भी अधिक दिनों तक नहीं चलती है
व्यक्ति चरित्र, जुबान, विश्वास आदि किसी से भी गिरा हुआ हो सकता है

शनिवार, ३१ अक्तूबर २००९

काठ की हंडी बार बार नहीं चढ़ती .

काठ की हंडी बार बार नहीं चढ़ती .
इसका मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को बार - बार मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है सिर्फ एक बार बनाया जा सकता है . जैसे काठ की हांडी चुलेह पर सिर्फ एक बार चढ़ती है बार - बार नहीं वैसे ही किसी को एक बार मूर्ख बनाया जा सकता है. .

मंगलवार, २७ अक्तूबर २००९

सो वो कानईं मे मूत्हे

लला को सिर पै बैठाहो,
सो वो कानईं में मूतहै।

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कानईं - कान में
बैठाहो - बैठाओगे
मूतहै - पेशाब करना
लला - लड़कों को देशज भाषा में बुलाने का शब्द
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भावार्थ - इसे कहावत के स्थान पर लोकोक्ति कहना ज्यादा उचित है। यह बुन्देलखण्ड में बहुत ही ज्यादा प्रचलन में है। इसका अर्थ यह लगाया जाता है कि किसी भी व्यक्ति या बच्चे को अधिक लाड-प्यार दीजिए तो वह बिगड़ैल होकर परेशान करने वालीं हरकतें करने लगता है।

बुधवार, ७ अक्तूबर २००९

एक कहावत

नौ सो चूहे खा कर बिल्ली हज को चली
यानि सौ गुनाह कर के कोई जब मंदिर जाता है अपना पाप धोने तब यह कहावत याद आती है...

मंगलवार, २९ सितम्बर २००९

एक कहावत पुरानी

पूत कपूत तो का धन संचय , पूत सपूत तो का धन संचय
इस कहावत के पीछे का मर्म यह है कि पूत अगर कपूत निकला तो उसके लिए धन संचय करके क्या फायदा , क्यों कि कपूत तो कमाया हुआ धन नष्ट कर देगा. और अगर वो सपूत निकला तो भी धन संचय कर के क्या फायदा , क्योकि सपूत खुद धन संचय कर सकता है. दोनों ही हालातो में मनुष्य को संग्रह कि नीति से बचना का सुझाव दिया गया है.