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चैत चना, वैशाख बेल - एक भोजपुरी कहावत

चइते चना, बइसाखे बेल, जेठे सयन असाढ़े खेल  सावन हर्रे, भादो तीत, कुवार मास गुड़ खाओ नीत  कातिक मुरई, अगहन तेल, पूस कर दूध से मेल  माघ मास घिव खिंच्चड़ खा, फागुन में उठि प्रात नहा ये बारे के सेवन करे, रोग दोस सब तन से डरे।
यह संभवतया भोजपुरी कहावत है। इसका अर्थ अभी पूरा मालूम नहीं है। फिर भी आंचलिक स्‍वर होने के कारण गिरिजेश भोजपुरिया की फेसबुक वॉल से उठाकर यहां लाया हूं।
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खंगार की जाति

"भोंर मछों और खंगार की जात सोतन  बधियो आधी रात " भावार्थ ;- शहद की बड़ी मधुमक्खी और खंगार जाति के  व्यक्ति बड़े ही खतरनाक होते हैं इसलिए उनका बध आधी रात के समय जब वे सोये हुए हो तब करना चाहिए ! इस कहावत में खंगार वीरों से शत्रुओं में ब्याप्त भय का बोध होता है ........

शुभ हो नया साल

नया वर्ष आ गया; वर्ष 2012 आ गया; पुराना वर्ष 2011 चला गया। इस समय समाचारों में लोगों का उत्साह दिखाया जा रहा है। घर के कमरे में बैठे-बैठे हमें यहां उरई में खुशी में फोड़े जा रहे पटाखों का शोर सुनाई दे रहा है। लोगों की खुशी को कम नहीं करना चाहते, हमारे कम करने से होगी भी नहीं। कई सवाल बहुत पहले से हमारे मन में नये वर्ष के आने पर, लोगों के अति-उत्साह को देखकर उठते थे कि इतनी खुशी, उल्लास किसलिए? पटाखों का फोड़ना किसलिए? रात-रात भर पार्टियों का आयोजन और हजारों-लाखों रुपयों की बर्बादी किसलिए? कहीं इस कारण से तो नहीं कि इस वर्ष हम आतंकवाद की चपेट में नहीं आये? कहीं इस कारण तो नहीं कि हम किसी दुर्घटना के शिकार नहीं हुए? कहीं इस कारण तो नहीं कि हमें पूरे वर्ष सम्पन्नता, सुख मिलता रहा? इसके बाद भी नववर्ष के आने से यह एहसास हो रहा है कि बुरे दिन वर्ष 2011 के साथ चले गये हैं और नववर्ष अपने साथ बहुत कुछ नया लेकर ही आयेगा। देशवासियों को सुख-समृद्धि-सफलता-सुरक्षा आदि-आदि सब कुछ मिले। संसाधनों की उपलब्धता रहे, आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे। कामना यह भी है कि इस वर्ष में बच्चियां अजन्मी न रहें; कामना …

लोकपाल बिल पर, आई कहावत

लोकपाल बिल पर सोनिया गांधी के भाजपा पर बरसने से पहले यूपीए के घटक दल संसद से वॉक ओवर कर चुके थे। ऐसे में सोनिया गांधी का भाजपा पर बरसना कुछ खास रहा। मेरे एक मित्र ने कहा यह तो


तबेले की बला और बंदर का सिर

वाली स्थिति हो गई। मैं संकोचवश पूछ नहीं पाया कि यह पुरानी कहावत है या उन्‍होंने मौजूदा  परिस्थिति को देखकर बनाई है। जो भी हो, यूपीए के तबेले में आई बला का भाजपा (बंदर) का यह संबंध भी कम रोचक नहीं है।


आपकी राय?????

लोक-कहावतों में स्वास्थय चर्चा

संसार में उसी व्यक्ति को पूर्ण रूप से सुखी कहा जा सकता है, जो कि शरीर से निरोगी हो. ओर निरोगी रहने के लिए यह आवश्यक है कि बच्चों को उनकी बाल्यावस्था ही से स्वस्थ रखने का ध्यान रखा जाए, उनको संयमी बनाया जाए, उनको ऎसी शिक्षा दी जाए, जिससे कि वे स्वस्थ रहने की ओर अपना विशेष ध्यान दे सकें.
माना कि समय की तेज रफ्तार के आगे आज शहरी और ग्रामीण समाज का अन्तर धीरे धीरे मिटता जा रहा है, लेकिन इतने पर भी आपको अभी भी गाँवों में बसते उस समाज की झाँकी देखने को मिल सकती है, जो कि युग परम्परा से श्रवण-ज्ञान द्वारा अपने स्वास्थय का ख्याल रखता आया है. यह ज्ञान बहुत कुछ उन्हे अपनी लोक-कहावतों में मिल जाता है.
आप देख सकते हैं कि लोक-कहावतों के ज्ञान के कारण ही आज भी अधिकाँश ग्रामीण समाज शहरी समाज की अपेक्षा कहीं अधिक स्वस्थ एवं निरोग मिलेगा.
लोक-कहावतों में प्रात:काल से लेकर रात्रि तक की विविध अनुभूतियाँ मिला करती हैं. कोई भी उनके अनुसार आचरण करके देख ले, उनकी सत्यता की गहरी छाप ह्रदय पर पडकर ही रहेगी. उदाहरणार्थ यहाँ कुछ कहावतें दी जा रही हैं-----
प्रात:काल खटिया से उठकै, पियै तुरन्तै पानी;

चन्द पंजाबी कहावतें

1. जून फिट्ट् के बाँदर ते मनुख फिट्ट के जाँजी

(आदमी अपनी जून खोकर बन्दर का जन्म लेता है, मनुष्य बिगड कर बाराती बन जाता है. बारातियों को तीन दिन जो मस्ती चढती है, इस कहावत में उस पर बडी चुटीली मार है.)

2. सुत्ते पुत्तर दा मुँह चुम्मिया
न माँ दे सिर हसा न प्यौ से सिर हसान


(सोते बच्चे के चूमने या प्यार-पुचकार प्रकट करने से न माँ पर अहसान न बाप पर)

3. घर पतली बाहर संगनी ते मेलो मेरा नाम

(घर वालों को पतली छाछ और बाहर वालों को गाढी देकर अपने को बडी मेल-जोल वाली समझती है)

4. उज्जडियां भरजाईयाँ वली जिनां दे जेठ

(जिनके जेठ रखवाले हों, वे भौजाईयाँ (भाभियाँ) उजडी जानिए)
पिता जाये तो छत जात है
भाई जाये तो बल
मंदिर सुना जब होय है
जब जात है माय

इसका मतलब है जब पिता चले जाते है यानि मर जाते है तो घर की छत ख़तम हो जाती है,यानि सुरक्षा. भाई मर जाते है यानि चला जाता है तो बल यानि शक्ति चली जाती है. मंदिर यानि घर सुना जब हो जाता है जब माँ की मृतुय हो जाती है.