अन्धो मे , काना राजा
यानि अगर किसी जगह कम पढ़े लिखे या कम हुनरमंद लोग हो वहा कोई जरा ज्यादा पड़- लिख गया हो या थोड़ा ज्यादा हुनरमंद हो तो वो अपनी ही बघारता रहता है। लोग उसी को चुनते है , पूजते है । जैसे इस इलेक्शन मे यूपीऐ अन्धो मे काना राजा बन गई ।
Friday, July 10, 2009
Thursday, July 9, 2009
एक बंगला कहावत
प्रीत कोरले भेबे कोरो, बेसी चुन लागले , मुख टा केते जबे , कोम होले , स्वाद आसबे न ।
यानि, प्रेम करना हो तो सोच समझ कर करे, ये पान में लगे चुने की तरह होता है। जयादा लग गया तो जीभ जल जाती है। कम लगे तो स्वाद नही आता है।
भेबे - सोच कर , कोरो - करना , होले - होने पर , बेसी - जयादा
यानि, प्रेम करना हो तो सोच समझ कर करे, ये पान में लगे चुने की तरह होता है। जयादा लग गया तो जीभ जल जाती है। कम लगे तो स्वाद नही आता है।
भेबे - सोच कर , कोरो - करना , होले - होने पर , बेसी - जयादा
Monday, June 22, 2009
अपना फिगर मत बिगाड़ना
जरणी जणै तो रतन जण, कै दाता कै सूर।
नींतर रहजै बांझड़ी, मती गमाजै नूर।।
नींतर रहजै बांझड़ी, मती गमाजै नूर।।
यह कहावत मैं कीर्ति कुमार जी के ब्लॉग अपनी भाषा अपनी बात से उठाकर लाया हूं।
जरणी- माता
जणै- पैदा करे
रतन- रत्न
सूर- शूरवीर
नींतर - नहीं तो
रहजै- रहना
गमाजै - गुमाना
अर्थ: इसमें स्त्री को सलाह दी गई है कि अगर पैदा ही करना है तो या तो वीर पुत्र पैदा करना या फिर दाता। वरना बांझड़ी रह जाना। बिना बात अपना नूर मत खो देना। शूरवीरों और दानदाताओं की धरती राजस्थान में यह लोकोक्ति बहुत आम है।
Monday, June 1, 2009
एक कहावत बंगाल की
सोरसे मोद्हे भूत , तहाले भूत केमोन भाग्बे
यानि सरसों में भूत है , तो भूत भागे गा कैसे ? यानि जब समस्या के मूल में ही समस्या है तो समस्या जायेगी कैसे?
यानि सरसों में भूत है , तो भूत भागे गा कैसे ? यानि जब समस्या के मूल में ही समस्या है तो समस्या जायेगी कैसे?
Wednesday, May 27, 2009
एक सार्वभौमिक पहेली
हिन्दयुग्म से साभार धरा से उगती उष्मा , तड़पती देहों के मेले
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो
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यहाँ उपभोग से ज़्यादा प्रदर्शन पे यकीं क्यों है
तटों को मिटा देने का तुम्हारा आचरण क्यों है
तड़पती मीन- तड़पन को अपना कल समझ लो
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो
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मुझे तुम माँ भी कहते निपूती भी बनाते हो
मेरे पुत्रों की ह्त्या कर वहां बिल्डिंग उगाते हो
मुझे माँ मत कहो या फिर वनों को उनका हक दो
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो
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मुझे तुमसे कोई शिकवा नहीं न कोई अदावत है
तुम्हारे आचरण में पल रही ये जो बगावत है
मेघ तुमसे हैं रूठे , बात इतनी सी समझ लो
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो
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