Saturday, May 31, 2008

माथै में दी

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माथै में दी
गांड भड़ाभड़ बोले


माथै : सिर
गांड़: गुदा
भड़ाभड़: विशेष तरह की आवाज

आमतौर पर कड़के आदमी के लिए इस प्रकार का विशेषण काम में लिया जाता है। जिस आदमी के पास अपनी बात कहने के पीछे ठोस आधार नहीं होता उसे भी यह बात कही जाती है।
दृश्य (विजुअलाइजेशन) : किसी व्यक्ति के सिर में डंडा मार रहे हैं और धड़ वाला भाग पाइप की तरह पूरा खाली होने के कारण पिछवाड़े से डण्डे की गूंज सुनाई दे रही है।
यह व्यंग और दुत्कार में काम में लिया जाता है।

नंगन की गड़ई भई

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नंगन की गड़ई भई,
बार बार हगन गई।



गड़ई का अर्थ है, लोटा जो कि एक धातुपात्र होता है

एक गॉंव के दरिद्र व्‍यक्ति, जिसके पास कुछ भी नहीं होता है, को अचानक एक
मिटृटी का पात्र मिल जाता है। अब चूँकि वह व्‍यक्ति तो दरिद्रता की वज़ह
से ही प्रसिद्ध था, अत: व़ह परेशानी में था कि अब कैसे गॉंव के लोगों को
यह पात्र दिखाकर अपनी धाक जमावे। तो वह बार-बार पात्र में जल भरकर शौच के
लिए जाता, जिससे लोगों को पता चल जाए कि दरिद्र के पास एक पात्र है।

अर्थात किसी मनुष्‍य के पास जब कोई वस्‍तु आती है, तो वह दुनिया को उस
वस्‍तु को दिखाने के सौ-सौ बहाने ढूँढा करता है। अब देखिए न, वह दरिद्र
व्‍यक्ति जिसके पास खाने-पीने की व्‍यवस्‍था तक नहीं है, वह मिट्टी का
पात्र लेकर बार-बार शौच के लिए जाता है, सिर्फ़ प्रदर्शन के लिए।

यह पोस्‍ट हमारे दोस्‍त अशोक कुमार वर्मा ने मेल से भेजा है। उनके इस सहयोग के लिए हार्दिक आभार। अन्‍य अंचलों के साथियों से भी अनुरोध है कि इस विद्या को बढाने में सहयोग करें।

Sunday, May 18, 2008

बींद रे पडे राळयों...

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बींद रै पडे राळयों तो

जॉनी बिचारा क्‍या करे


बींद: वर
राळयो: लार टकपना
जॉनी: बारात में साथ आए लोग

इसका अर्थ है कि समस्‍या का मुख्‍य किरदार ही लालच में है तो जुडे हुए अन्‍य लोग तो उसका कुछ भी समाधान करने में समर्थ नहीं होंगे।

कहानी इस तरह है कि- वर को लेकर बाराती दुल्‍हन के घर तक जाते हैं। बारात पहुंचती है तो उसका ढंग से स्‍वागत नहीं किया जाता। वधू पक्ष के लोग भी खातिर नहीं करते। व्‍यवस्‍थाएं गडबडाई हुई होती हैं। इस पर लोग वर के पिता से शिकायत करते हैं। वर का पिता इतने खराब व्‍यवहार को देखते हुए शादी तोडने के लिए तैयार हो जाता है लेकिन वर अपनी फियांसी पर लट्टू होता है। न तो शादी टूटती है और न अतिथियों का सत्‍कार होता है। अब रिश्‍तेदार बार-बार वर के पिता के पास शिकायत लेकर आते हैं। तो वर का पिता कहता है बींद रै पडे राळयो तो जॉनी बिचारा क्‍या करे। इस कहावत को अन्‍य प्रकार की समस्‍याओं में भी इस्‍तेमाल किया जाता है बस वर की तरह समस्‍या में मुख्‍य किरदार लालच में फंसा हुआ होना चाहिए।

Friday, May 16, 2008

आप मरियो जुग परलय

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आप मरियो जुग परलय

आप: खुद
मरियो: मरने पर
जुग: सृष्टि
परलय: प्रलय

मेरी मौत आ जाए तो भले ही प्रलय हो जाए। जो लोग यह मानते हैं कि मेरे जिन्‍दा रहने तक ही सृष्टि है उन लोगों का यह भी मामना होता है कि उनके मरने के बाद तो प्रलय हो जाएगी। भले ही प्रलय न हो लेकिन उनके लिए फिर दुनिया का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। आमतौर पर इस कहावत का इस्‍तेमाल वर्तमान की उन समस्‍याओं के लिए किया जाता है जिनका सॉल्‍यूशन दिखाई नहीं दे रहा होता है। वे कहते हैं कि हम तो मर जाएंगे बाद में भले ही इन समस्‍याओं के साथ प्रलय आ जाए।

बिगडे भ्‍यों रो नाई

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बिगडियोडे भ्‍यौं में नाई फिरे ज्‍यां फिरे

बिगडियोडे: बिगडे हुए
भ्‍यौं: विवाह
नाई: शादी में काम करने वाला वह व्‍यक्ति को दो परिवारों के बीच सांमजस्‍य का काम करता है
फिरे: घूम रहा है

नाई दो परिवारों में सामंजस्‍य बिठाकर शादी की स्थिति पैदा करता है। परिवार से बाहर का आदमी होने के बावजूद उसकी पंचायती सबसे ज्‍यादा होती है। लेकिन जब शादी बिगड जाती है तो नाई को कोई नहीं पूछता। वह किंकर्तव्‍यमूढ सा घूमता रहता है। न कोई उसके पास आता है न वह किसी को पास जा पाता है।
जो व्‍यक्ति बिना कारण अनुपयुक्‍त स्‍थान पर विमजिकल सा खडा होता है उसे बिगडे हुए विवाह के नाई की संज्ञा देते हैं।

Thursday, May 8, 2008

ब्‍याह बिगाडे दो जणा, कै मूंझी कै मेह

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कहावत है
ब्‍याह बिगाडे दो जणा, कै मूंझी कै मेह
ब्‍याह शादी
जणा लोग
कै या फिर
मूंझी कंजूस
मेह बारिश
यानी दो लोग शादियां बिगाडते हैं, या तो कंजूस और बारिश।

Wednesday, May 7, 2008

बाबल हो छीछर आळो...

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'बाबल हो छीछर आळो
खसम मिल ग्‍यो घूघर आळो'


बाबल - पिता
छीछर - फटे हुए कपडे
खसम - पति
घूघर - सोने की पगरखी
आळो - वाला

सास बहू की लडाइयां जग प्रसिद्ध हैं। सास काठ की भी हो तो बहू तो सुहाती नहीं है और बहू कुछ भी जतन कर ले सास खुश नहीं होती। ऐसे में पति का प्‍यार पाने वाली ऐसी बहू जिसका पीहर ज्‍यादा पैसे वाला नहीं होता, जब कोई ऊंची बात कह जाती है तो सास ताना देती है कि पिता के घर में तो कुछ देखा नहीं और पति (उसका बेटा) बहू को अच्‍छा मिला गया।

Tuesday, May 6, 2008

फूहड घर में लगी किंवाडी...

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"फूहड घर में लगी किंवाडी

सगळा कुत्ता चल्‍या रेवाडी

बूढे कुत्ते लियो सुण

लगाई तो है पर ढकसी कूण"



किंवाडी - जाली का दरवाजा जो मुख्‍यद्वार से आगे होता है
सगळा - सभी
सुण - सुनना
ढकसी - बंद करना
कूण - कौन

यह कहावत है फूहड लोगों के लिए कि वे कोई भी व्‍यवस्‍था क्‍यों न कर लें जब तक सिस्‍टम के लोग सक्रिय नहीं होंगे तब तक व्‍यवस्‍था सुचारू नहीं हो सकती।

कहानी यह है कि एक बडा घर था, उसमें काफी लोग रहते थे लेकिन कोई भी अपनी जिम्‍मेदारी नहीं समझता था, सब अपने में मस्‍त रहते। इसका फायदा गली के कुत्ते उठाते और जब-तब घर में घुस जाते थे। घर के मालिक से इस समस्‍या के समाधान के लिए एक रास्‍ता निकाला कि घर के मुख्‍य द्वार के आगे लकडी का जालीदार छोटा गेट लगा दिया। कुत्तों ने सोचा कि अब हमारी दाल यहां नहीं गलेगी तो वे वहां से रवाना हो गए। कुत्तों में एक सयाना बुढ्ढा कुत्ता था उसने जब यह बात सुनी तो हंसा। बोला किंवाडी लगाने से कुछ नहीं होता इसे ढकना भी पडता है। जैसे मुख्‍य द्वार खुला रहता है वैसे ही किंवाडी भी खुली रहेगी। बूढे कुत्ते की बात सुनकर बाकी कुत्तों की जान में जान आई। इसके बाद सभी कुत्ते सुख से वहीं रहने लगे और घ्‍ार के अन्‍दर और बाहर आते-जाते रहे।

Sunday, May 4, 2008

शुरु होता है कहावतों का सफर

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यह ब्लॉग समर्पित है लोक अंचल की ऐसी कहावतों को जो क्षेत्र विशेष में तो बहुत बोली जाती है लेकिन किन्हीं कारणों से कभी प्रिंट नहीं होती। कहावतों की मिठास, चुभन और मिट्टी की खुशबू की बानगी देखने को मिलेगी इस उम्मीद के साथ हम यह ब्लॉग शुरु कर रहे हैं।
 

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