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Showing posts from August, 2009

एक कहावत बिहार की

खिसियानी बिल्लैअ , खंभा नोचे .
ये कहावत तब बोली जाती है जब कोई व्यक्ति कुछ करना चाहता है पर वो काम नहीं कर पता तो हताशा में उस काम या उससे जुड़े व्यक्ति के बारे में गलत - सही बोलना शुरु कर देता है. क्यों कि उस काम या व्यक्ति का कुछ नहीं बिगड़ता है" बिल्ली " सिर्फ खब नोच कर ही रह जाती है.

बछ्वा बैल बहुरिया जोय, ना हर बहे ना खेती होय---एक भोजपुरी कहावत्

किसी भी समाज की लोकसंस्कृ्ति को यदि जानना हो तो उसके लिए उस समाज में प्रचलित कहावतों से बढकर अन्य कोई श्रेष्ठ माध्यम हो ही नहीं सकता। क्यों कि इनमें उस समाज के पूर्वजों द्वारा संचित किया गया सदियों का अनुभव एवं इतिहास समाहित होता है। यदि ये कहा जाए कि कहावतें लोक जीवन की चेतना हैं तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। श्री सिद्धार्थ जोशी जी ने जो इस कम्यूनिटी ब्लाग के जरिये अपनी लोक संस्कृ्ति से परिचय कराने का एक प्रयास आरंभ किया है,उसके लिए यें साधुवाद के पात्र हैं। आज इस ब्लाग की सदस्यता के रूप में उन्होने जब मुझे भी इस पथ का अनुगामी बनने को आमंत्रित किया तो उसे अस्वीकार करने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था।
चलिए आज अपनी इस भूमिका का श्रीगणेश करते हुए आपका परिचय एक भोजपुरी कहावत से कराया जाए।

बछ्वा बैल बहुरिया* जोय, ना हर* बहे ना खेती होय। इस कहावत के माध्यम से यह बताया गया है कि किसी भी महत्वपूर्ण कार्य को करने के लिए सदैव क्षमतावान व्यक्ति का ही चुनाव करना चाहिए। यदि किसी अक्षम व्यक्ति को उस कार्य की जिम्मेदारी सौंप दी जाए तो न तो वो कार्य ठीक से सम्पूर्ण हो पायेगा और न ही उसका प्रतिफल मिलेग…

जैसे उदई, तैसेई भान

जैसे उदई, तैसेई भान,
न उनके चुटिया, न उनके कान।

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भावार्थ - इसका अर्थ इस रूप में लगाया जाता है जब किसी भी काम को करने के लिए एक जैसे स्वभाव के लोग मिल जायें और काम उनके कारण बिगड़ जाये।
कहा जा सकता है कि बेवकूफों को काम सौंपने से ही इस कहावत का जन्म हुआ होगा।

एक कहावत

सारा धन लूट गया ,मोहर पर छाप मारे
यह कहावत उस समय इस्तेमाल होती है जब कोई व्यक्ति अपना सबकुछ लूटा कर अंत में जगता है और नगण्य बची हुई चीजो को अपनी- अपनी कह कर बचने कि कोशिश करता है उस समय इस कहावत का इस्तेमाल किया जाता है.

दो कहावतें मेल से पहुंची

कहावतें ब्‍लॉग के पाठक न सिर्फ पढ़कर फुर्सत पा लेते हैं बल्कि रोचक टिप्‍पणियां भी करते हैं, कभी सलाहें और मशविरे भी होते हैं। कुछेक कहावतें भी आती हैं। पिछले दो दिनों में दो टिप्‍पणियों में दो कहावतें अतिरिक्‍त आई हैं। प्रस्‍तुत हैं
कमाऊ आवे डरता
निखट्टू आवे लड़ता

यह भेजी है Vandanaजी ने

जबरा मारै रोवै न दे.
यह भेजी है मीनू खरेजी ने
दोनों पाठकों का हृदय से आभार और एक सलाह भी कि क्‍यों न वे खुद इस ब्‍लॉग में कभी कभार कहावतें पोस्‍ट किया करें। इन दोनों कहावतों को मैं समझ सकता हूं लेकिन खुद लेखक जो भाव लेकर लिखता है उसकी बराबरी नहीं हो सकती। इसलिए बिना विश्‍लेषण प्रस्‍तुत है जैसी मिली वैसी की वैसी कहावतें।

एक कहावत बिहार की

बकरे की माई कब तक खैर मनाई


यानि बकरे की माँ का बेटा - बकरा कितने दिन जिन्दा रहे गा ,उसके मोटा - तगडे होने भर का इन्तेजार किया जाता है फ़िर उसे काट कर उसे पलनेवाले खा जाते है। इसलिए बकरे की माँ ज्यादा दिन तक अपने बच्चे होने की खुशी नही मना सकती है।
हम सभी की हालत एक जैसी है कबतक खुशिया मनाये आज नही तो कल वाट लगनेवाली रहती है। खास करके औरतो की । उसके घरवालो को लड़केवालो के सामने आज नही तो कल झुकना पड़ता है लड़की की शादी के लिए, ऐसी मान्यता आज भी हमारे बिहारी समाज में है।

एक कहावत

हींग लगे न फिटकरी ,और रंग भी चोखा

यानि मेहनत नही लगना किसी काम में पर उसका परिणाम अच्छा मिल जाना । प्राय दलाली के धंधे को इसी मुहावरे से समझाया जाता है। और आज -कल हमारे देश में नेता, मीडियाकर्मी , डाक्टर सभी इसी मुहावरे के अनुसार जीना चाहते है।
बासी कढ़ी में उबाल आना

यहाँ बासी कढ़ी का मतलब पुरानी इच्छाओ से है । वक्त बीत जाने के बाद अगर हम उन पालो को जीने की बेकार कोशिश करते है तब शायद यही कहा जाता होगा बासी कढ़ी
में उबाल लाया जा रहा है।

एक बंगला कहावत

धर्मे कोल , बतासे नोडे

धर्मं का चक्का या मशीन हवा यानि कि प्रकृति के नियम से चलता है ।

कोल - मशीन , बतासे - हवा , नोडे - चलना