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नंगन की गड़ई भई

नंगन की गड़ई भई,
बार बार हगन गई।



गड़ई का अर्थ है, लोटा जो कि एक धातुपात्र होता है

एक गॉंव के दरिद्र व्‍यक्ति, जिसके पास कुछ भी नहीं होता है, को अचानक एक
मिटृटी का पात्र मिल जाता है। अब चूँकि वह व्‍यक्ति तो दरिद्रता की वज़ह
से ही प्रसिद्ध था, अत: व़ह परेशानी में था कि अब कैसे गॉंव के लोगों को
यह पात्र दिखाकर अपनी धाक जमावे। तो वह बार-बार पात्र में जल भरकर शौच के
लिए जाता, जिससे लोगों को पता चल जाए कि दरिद्र के पास एक पात्र है।

अर्थात किसी मनुष्‍य के पास जब कोई वस्‍तु आती है, तो वह दुनिया को उस
वस्‍तु को दिखाने के सौ-सौ बहाने ढूँढा करता है। अब देखिए न, वह दरिद्र
व्‍यक्ति जिसके पास खाने-पीने की व्‍यवस्‍था तक नहीं है, वह मिट्टी का
पात्र लेकर बार-बार शौच के लिए जाता है, सिर्फ़ प्रदर्शन के लिए।

यह पोस्‍ट हमारे दोस्‍त अशोक कुमार वर्मा ने मेल से भेजा है। उनके इस सहयोग के लिए हार्दिक आभार। अन्‍य अंचलों के साथियों से भी अनुरोध है कि इस विद्या को बढाने में सहयोग करें।

Comments

सही कहा.
अशोक जी का भी ब्लाग बनवा दीजिये.

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चैत चना, वैशाख बेल - एक भोजपुरी कहावत

चइते चना, बइसाखे बेल, जेठे सयन असाढ़े खेल  सावन हर्रे, भादो तीत, कुवार मास गुड़ खाओ नीत  कातिक मुरई, अगहन तेल, पूस कर दूध से मेल  माघ मास घिव खिंच्चड़ खा, फागुन में उठि प्रात नहा ये बारे के सेवन करे, रोग दोस सब तन से डरे।
यह संभवतया भोजपुरी कहावत है। इसका अर्थ अभी पूरा मालूम नहीं है। फिर भी आंचलिक स्‍वर होने के कारण गिरिजेश भोजपुरिया की फेसबुक वॉल से उठाकर यहां लाया हूं।

नंगा और नहाना

एक कहावत : नंगा नहायेगा क्या और निचोडेगा क्या ?
यानि जो व्यक्ति नंगा हो वो अगर नहाने बैठेगा तो क्या कपड़ा उतारेगा और क्या कपड़ा धोएगा और क्या कपड़ा निचोडेगा। मतलब " मरे हुए आदमी को मार कर कुछ नही मिलता" ।
होली की शुभ कामनाये सभी को।
माधवी

एक कहावत

न नौ मन तेल होगा , न राधा नाचेगी ।
ये कहावत की बात पुरी तरह से याद नही आ रही है, पर हल्का- हल्का धुंधला सा याद है कि ऐसी कोई शर्त राधा के नाचने के लिए रख्खी गई थी जिसे राधा पुरी नही कर सकती थी नौ मन तेल जोगड़ने के संदर्भ में । राधा की माली हालत शायद ठीक नही थी, ऐसा कुछ था। मूल बात यह थी कि राधा के सामने ऐसी शर्त रख्खइ गई थी जो उसके सामर्थ्य से बाहर की बात थी जिसे वो पूरा नही करपाती। न वो शर्त पूरा कर पाती ,न वो नाच पाती।
अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम ,
दास मलूका कह गए सब के दाता राम ..
तात्पर्य -  अजगर किसी की नौकरी नहीं करता और पक्षी भी कोई काम नहीं करते भगवान सबका पालन हार है इसलिए कोई काम मात करो भगवान स्वयं ही देगा आलसी लोगों के लिए मलूक दास जी की ये पंक्तियाँ रामबाण है !

खंगार की जाति

"भोंर मछों और खंगार की जात सोतन  बधियो आधी रात " भावार्थ ;- शहद की बड़ी मधुमक्खी और खंगार जाति के  व्यक्ति बड़े ही खतरनाक होते हैं इसलिए उनका बध आधी रात के समय जब वे सोये हुए हो तब करना चाहिए ! इस कहावत में खंगार वीरों से शत्रुओं में ब्याप्त भय का बोध होता है ........