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माताजी के मटके

माताजी गढ़ में बैठी मटका करै
बाणिए ने बेटो देर देख

मटका: हंसी ठिठोली
देर: देकर

यह कहावत है लोक देवता भैरवजी और देवी मां के संवाद की। कहानी कुछ यूं है कि एक बार एक बणिए के कोई संतान नहीं होती। वह सभी देवी देवताओं से मनौतियां मांग लेता है। पत्‍थर-पत्‍थर पूजने वाला बणिया आखिर में हताश होकर जंगल के किनारे बने एक भैरूं जी के पास जाता है। वहां खड़ा एक आदमी बणिए को देखकर सोचता है कि बणिया फोकट में भैरूंजी से आशीर्वाद न ले ले। वह बणिए को सचेत करता है कि अगर मन्‍नत पूरी हुई तो यहां पाडा (भैंस का बच्‍चा) चढ़ाना पड़ेगा। बणिया संकल्‍प कर लेता है। भैरूंजी की कृपा होती है और सालभर के अन्‍दर ही बणिए के बेटा हो जाता है। बणिया जबान का पक्‍का होता है। वह भैंस का पाडा लेकर भैरूंजी के मंदिर पहुंच जाता है। जैसे ही पाडे की गर्दन काटने को उदयत होता है तो बणिए के हाथ कांप जाते हैं। कई देर के मानसिक द्वंद्व के बाद बणिया यह कहकर भैरूंजी के पत्‍थर के साथ डोरी से पाडे को बांध देता है कि तेरा पाडा तूं जाने। पाडा कई देर तक भैरूंजी से बंधा खड़ा रहता है। इसके बाद जोर लगाकर भैरूंजी को धरती से बाहर खींच लेता है। अब पाडा दौड़ता जाता है और भैरूंजी उसके पीछे। इस तरह भैरूंजी घिसटते हुए गढ़ के आगे से निकलते हैं। गढ़ में बने मंदिर में माताजी भैंरूजी को देखती है तो हंसने लगती हैं। तो भैंरूजी चिढ़कर कहते हैं। माताजी गढ़ में बैठ मटका करो, बाणिए नै बेटो देर देखो।
इस कहानी को भस्‍मासुर की कहानी से भी जोड़ा जा सकता है लेकिन इस कहावत में गलत व्‍यक्ति के प्रति की गई दया और सहायता करने का दर्द शिद्दत से महसूस होता है।

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