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एक टिप्पणी इधर भी

चिट्ठा चर्चा, में स्वर्गीय-श्री प्रह्लाद नारायण मित्तल से मुलाक़ात कीजिए,
उड़न तश्तरी ब्लॉग-"आलसी काया पर कुतर्कों की रजाई" डाल कर गज़ब तीर चला दिया
मुझको नहीं पता कविता क्या हैं फ़िर भी लिखे जा रहे हैं उधर लोग बाग़ एक परम स्वादिष्ट कविता , परोसे जा रहें हैं साक़ी शराब दे दे .----कुछ लोग ये गा-गा कर दिन को नशीला बनाने आमादा हैं.बेट्टा, ब्लागिंग छोड़ो ,मौज से रहो, अब भैया का नारा देकर पंडित जी ने गज़ब ढा दिया आँख की किरकिरी-की ताज़ा पोस्ट की "ईश्वर धर्म और आस्था के सहारे मृत्यु का इंतज़ार ही क्या हमारे बुज़ुर्गों के लिए बच गया काम है ?" की इस पंक्ति ने आंख्ने भिगो दीं .शीतल राजपूत के चिट्ठे का स्वागत ज़रूरी है,कुछ दिनों से ब्लॉगन-ब्लागन वार देख के मन खट्टा तो हुआ था किंतु जब ये मारें लातई-लात कहावत देखी तो लगा शायद कोई रास्ता काढ़ लिया जाएगा
माँ कविता प्रति इसे मेरा आभार मानिए .
तैयार रहिये अपने ब्लॉग पर टिप्पणियों की बरसात के लिए , बांचते ही अपन की बांछें खिल गई अपन भी टिप्पणी पाने की दावेदारी बनाम लालच से भरा ब्लागिया दिल लेकर आज की पोस्ट लिख रहें हैं

Comments

Udan Tashtari said…
बेहतरीन चिट्ठा चर्चा!! :) जारी रहें.
सुन्दर! आप चिट्ठाचर्चा काहे नहीं आते जी!

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चैत चना, वैशाख बेल - एक भोजपुरी कहावत

चइते चना, बइसाखे बेल, जेठे सयन असाढ़े खेल  सावन हर्रे, भादो तीत, कुवार मास गुड़ खाओ नीत  कातिक मुरई, अगहन तेल, पूस कर दूध से मेल  माघ मास घिव खिंच्चड़ खा, फागुन में उठि प्रात नहा ये बारे के सेवन करे, रोग दोस सब तन से डरे।
यह संभवतया भोजपुरी कहावत है। इसका अर्थ अभी पूरा मालूम नहीं है। फिर भी आंचलिक स्‍वर होने के कारण गिरिजेश भोजपुरिया की फेसबुक वॉल से उठाकर यहां लाया हूं।

नंगा और नहाना

एक कहावत : नंगा नहायेगा क्या और निचोडेगा क्या ?
यानि जो व्यक्ति नंगा हो वो अगर नहाने बैठेगा तो क्या कपड़ा उतारेगा और क्या कपड़ा धोएगा और क्या कपड़ा निचोडेगा। मतलब " मरे हुए आदमी को मार कर कुछ नही मिलता" ।
होली की शुभ कामनाये सभी को।
माधवी

एक कहावत

न नौ मन तेल होगा , न राधा नाचेगी ।
ये कहावत की बात पुरी तरह से याद नही आ रही है, पर हल्का- हल्का धुंधला सा याद है कि ऐसी कोई शर्त राधा के नाचने के लिए रख्खी गई थी जिसे राधा पुरी नही कर सकती थी नौ मन तेल जोगड़ने के संदर्भ में । राधा की माली हालत शायद ठीक नही थी, ऐसा कुछ था। मूल बात यह थी कि राधा के सामने ऐसी शर्त रख्खइ गई थी जो उसके सामर्थ्य से बाहर की बात थी जिसे वो पूरा नही करपाती। न वो शर्त पूरा कर पाती ,न वो नाच पाती।
अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम ,
दास मलूका कह गए सब के दाता राम ..
तात्पर्य -  अजगर किसी की नौकरी नहीं करता और पक्षी भी कोई काम नहीं करते भगवान सबका पालन हार है इसलिए कोई काम मात करो भगवान स्वयं ही देगा आलसी लोगों के लिए मलूक दास जी की ये पंक्तियाँ रामबाण है !

खंगार की जाति

"भोंर मछों और खंगार की जात सोतन  बधियो आधी रात " भावार्थ ;- शहद की बड़ी मधुमक्खी और खंगार जाति के  व्यक्ति बड़े ही खतरनाक होते हैं इसलिए उनका बध आधी रात के समय जब वे सोये हुए हो तब करना चाहिए ! इस कहावत में खंगार वीरों से शत्रुओं में ब्याप्त भय का बोध होता है ........