Skip to main content

नर्मदांचल,बुन्देली, की लोकोक्तियाँ:-01



  • नर्मदांचल
    हरदा,टिमरनी, क्षेत्र में मुझे जो लोकोक्ति सबसे पसंद आई :"बोर पकी रीछडी का डोला आया"
    बोर:बेर,
    रीछडी: मादा-रीछ,
    डोला:आँखें
    जब बेर पकी तो मादारीछ आंखों मे कन्जक्टिवाईटिस हुआ यानी सही अवसर को खो देना

  • बुन्देली:"मरी जान मल्हारी गावे" मरी-जान: कमजोर शरीर वाला,/वाली, मल्हारी:-राग मल्हार शख्शियत के अनुकूल काम न करना,इसे यह भी कहा जा सकता है सीमोल्घंन करना

Comments

Udan Tashtari said…
अच्छा है, जारी रखिये कलेक्शन.
गिरीशजी
आपने धमाकेदार एंट्री की है। फोटो लगाकर तो आपने आंचलिक स्‍वाद को और भी बढा दिया है। उम्‍मीद करता हूं कि नर्मदा अंचल की ऐसी मीठी बोली का रस लगातार मिलता रहेगा।
एंट्री देना ही ज़ोर दार मामला है सो छाप मरा
मत चूके चौहान की तर्ज़ पे
आपका आभारी हूँ
आपका ब्लॉग मे वर्णित सामाग्री निःसंदेह अमूल्य है कहावतों का संग्रह बहुत पसंद आया ,आपकी मेरे ब्लाग मे कुछ टिप मेरे लिए मार्गदर्शन का काम कर रही आपका ब्लाग की ले आउट भी बहुत सुंदर है,कृपया इस बरे मे कुछ सलाह देने का कष्ट करेगे
बहुत सुन्दर प्रयास है

Popular posts from this blog

चैत चना, वैशाख बेल - एक भोजपुरी कहावत

चइते चना, बइसाखे बेल, जेठे सयन असाढ़े खेल  सावन हर्रे, भादो तीत, कुवार मास गुड़ खाओ नीत  कातिक मुरई, अगहन तेल, पूस कर दूध से मेल  माघ मास घिव खिंच्चड़ खा, फागुन में उठि प्रात नहा ये बारे के सेवन करे, रोग दोस सब तन से डरे।
यह संभवतया भोजपुरी कहावत है। इसका अर्थ अभी पूरा मालूम नहीं है। फिर भी आंचलिक स्‍वर होने के कारण गिरिजेश भोजपुरिया की फेसबुक वॉल से उठाकर यहां लाया हूं।

नंगा और नहाना

एक कहावत : नंगा नहायेगा क्या और निचोडेगा क्या ?
यानि जो व्यक्ति नंगा हो वो अगर नहाने बैठेगा तो क्या कपड़ा उतारेगा और क्या कपड़ा धोएगा और क्या कपड़ा निचोडेगा। मतलब " मरे हुए आदमी को मार कर कुछ नही मिलता" ।
होली की शुभ कामनाये सभी को।
माधवी

एक कहावत

न नौ मन तेल होगा , न राधा नाचेगी ।
ये कहावत की बात पुरी तरह से याद नही आ रही है, पर हल्का- हल्का धुंधला सा याद है कि ऐसी कोई शर्त राधा के नाचने के लिए रख्खी गई थी जिसे राधा पुरी नही कर सकती थी नौ मन तेल जोगड़ने के संदर्भ में । राधा की माली हालत शायद ठीक नही थी, ऐसा कुछ था। मूल बात यह थी कि राधा के सामने ऐसी शर्त रख्खइ गई थी जो उसके सामर्थ्य से बाहर की बात थी जिसे वो पूरा नही करपाती। न वो शर्त पूरा कर पाती ,न वो नाच पाती।
अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम ,
दास मलूका कह गए सब के दाता राम ..
तात्पर्य -  अजगर किसी की नौकरी नहीं करता और पक्षी भी कोई काम नहीं करते भगवान सबका पालन हार है इसलिए कोई काम मात करो भगवान स्वयं ही देगा आलसी लोगों के लिए मलूक दास जी की ये पंक्तियाँ रामबाण है !

खंगार की जाति

"भोंर मछों और खंगार की जात सोतन  बधियो आधी रात " भावार्थ ;- शहद की बड़ी मधुमक्खी और खंगार जाति के  व्यक्ति बड़े ही खतरनाक होते हैं इसलिए उनका बध आधी रात के समय जब वे सोये हुए हो तब करना चाहिए ! इस कहावत में खंगार वीरों से शत्रुओं में ब्याप्त भय का बोध होता है ........