Tuesday, February 24, 2009

फरसे का लैणायत

यह कहावत देखने में ऐसा लगता है कि खराब शब्‍दों से बनी है लेकिन है मजेदार और ज्ञान देने वाली भी है। 

गांड रो गड़ और फरसे रो लैणायत 

गांड- गुदा द्वार 
गड़ - जो चुभता है 
फरसा- घर के सामने का स्‍थान 
लैणायत- वह जिसने आपको उधार दिया है 

इसका अर्थ यह हुआ कि गुदा में चुभने वाला यानि मलद्वार का मस्‍सा और घर के सामने रहने वाला लेनदार कभी नहीं होना चाहिए। दोनों नियमित रूप से दुख देते हैं। मस्‍सा रोजाना सुबह तंग करेगा तो लेनदार घर से निकलते घुसते मुस्‍कुराएगा तो भी ऐसा लगेगा कि उधार के रुपए वापस मांग रहा है। इस कारण दोनों की नहीं रखने चाहिए। इसमें दोनों की तुलना भी है और दोनों से बचने की सीख भी दी गई है। 

4 विचार आए:

आलोक सिंह said...

प्रणाम
वयस्क शब्दों का प्रयोग है पर अर्थ और भाव बहुत उत्तम है .
धन्यवाद

राज भाटिय़ा said...

धन्यवाद

विष्णु बैरागी said...

लोक कहावतों की व्‍यंजना लाजवाब होती हैं।

Abhishek said...

लोक शब्द हैं तभी तो लोक कहावतें हैं. अर्थ वाकई महत्वपूर्ण है.

 

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