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एक कहावत

जातो गवाए , भातो न खाए

यानि कि जिस किसी कारण से किसी ने अपना अस्तित्व खोया या अपनी पहचान खोयी ,वो काम भी पूरा नही हुआ और पहचान भी गई ।
यानि पहचान भी गई और काम भी नही हुआ ।
जातो - जाति भात - भोजन ,चावल

Comments

कई भाषओं में मामूली हेर फेर के साथ यह कहावत बहुत ही प्रचलित है। जैसे मैथिली में - " ऐंठो खेलहुँ, पेटो नहि भरल" अर्थात जूठा भी खाये और पेट भी नहीं भरा।

लेकिन महोदय मैं अपनी कहावतें कैसे भेजूँ? जरा इमेल तो बताइये ताकि मैं भी समय समय पर जोड़ता रहूँ।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
Anonymous said…
सुमन जी मैंने आपको आमंत्रण भेज दिया है। आपकी मेल इनबॉक्‍समें होगा। संभालिए। जो लिंक उस मेल में आया है उस पर चटका लगाइए आप सीधे सदस्‍य बन जाएंगे। अगर मेल न मिली हो तो सूचित कीजिएगा।
Anonymous said…
सिद्धार्थ जोशी
VIPUL said…
बहुत सुंदर .. हमारे यहां कहा जाता है 'जातो गंवाया , स्‍वादो न पाया'।
imnindian said…
vipul ji aap ka blog public nahi hai. kripya ise public kare.

madhavi shree
भाषाई भिन्नताओं के चलते अक्सर एक तरह की ही कईं कहावतें हमारे समाज में देखने को मिल जाती है.
Happy Bird said…
Mujhe hindi me comment likhna nahi aata hai isliye hinglish me likh rahe hu. Ye blog bahut he sunder hai. Mein bhi apne prant Rajasthan ke ek Kahavat likh rahi hu.

"Sasara Sukh Vasara, Teen din ka AAsara"

Iska Matlab Ladka ke liye Sasural sabse sukhdaye jagah hoti hai lekin Sirf 3 din tak. Agar uske baad vo sasural me rahta hai to amavas ke tarah dhire dhire uska Samman kam hone lagta hai.

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चैत चना, वैशाख बेल - एक भोजपुरी कहावत

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यह संभवतया भोजपुरी कहावत है। इसका अर्थ अभी पूरा मालूम नहीं है। फिर भी आंचलिक स्‍वर होने के कारण गिरिजेश भोजपुरिया की फेसबुक वॉल से उठाकर यहां लाया हूं।

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दास मलूका कह गए सब के दाता राम ..
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