Skip to main content

कहावतों के इक्‍कीस प्रेमी

इस ब्‍लॉग में अब तक बीस ब्‍लॉगर लेखक के रूप में जुड़ चुके हैं। इनमें से कुछ इतने सक्रिय हैं कि 
वे नित नई कहावतों से दूसरों को भी सक्रिय कर देते हैं।
इस ब्‍लॉग के लेखक 
इनमें से अधिकांश लेखकों ने किसी ने किसी समय पर तूफानी पारियां खेली 
और अब भी कई बार चौके छक्‍के मारकर निकल जाते हैं। 
इससे आंचलिक कहावतों का एक ऐसा संदर्भ कोष तैयार हो रहा है 
जो आने वाली पीढ़ी के काम आ सकता है। 
इसके पीछे एक और अभिलाषा है कि आंचलिक कहावतों में से समानार्थक कहावतों को लेकर 
उनका विश्‍लेषण भी किया जाए। 
हालांकि कुछ कहावतें ऐसी आ चुकी हैं 
लेकिन अभी और बहुत सी कहावतों का इंतजार यह ब्‍लॉग कर रहा है। 
उम्‍मीद करता हूं कि भविष्‍य में और भी गुणीजन इस ब्‍लॉग से जुड़ेंगे 
और इस संदर्भ कोष को समृद्ध करने में सहायता करेंगे। 

Comments

बीस लेखक और एक आप जो इसे पढ़ रहे हैं। हो गए ना इक्‍कीस। :)
अच्‍छा !! इसमें इतने लोग लिखते हैं !!
@ संगीता जी

नमस्‍कार,
आपका योगदान भी मिले तो यह ब्‍लॉग और समृद्ध होगा।
Udan Tashtari said…
बहुत साधुवाद इस उम्दा कार्य और प्रयास के लिए.
Anil said…
कहावतों के जरिये अपने अतीत से मुलाकात करवाने, और देश के एकीकरण में योगदान देने के लिये सहस्र धन्यवाद!
आपका ये प्रयास सचमुच प्रशंसनीय है...आभार
बहुत अच्छा प्रयास है यह ..आने वाले भविष्य में बहुउपयोगी होगा यह ब्लॉग ..सभी लिखने वालों का शुक्रिया
imnindian said…
mujeh bhi bahut anand aaya isme hissa lekar. aisalaga jiase bachpan me school me kisi pratiyogita me hissa le rahe ho....
sabhi sahyogiyo aur pathako ka tahe dil se dhanyawad.
Madhavi
Abhishek Mishra said…
आंचलिक कहावतों के संकलन में सहभागी बनने की चाह ने ही मुझे इस ब्लॉग से जोड़ा. आपके प्रयास के प्रति शुभकामनाएं.
सिद्धार्थ जी मेरा नाम तो इस लिस्ट से गायब ही कर दिया आपने :)
सतीश जी
आप सही कह रहे हैं। मुझसे चूक हो गई। मैं माफी चाहता हूं।

आपका नाम इस लिस्‍ट में जोड़कर फिर से प्रकाशित करूंगा।

एक बार फिर माफी चाहता हूं। मेरा कोई ऐसा इरादा नहीं था।

Popular posts from this blog

चैत चना, वैशाख बेल - एक भोजपुरी कहावत

चइते चना, बइसाखे बेल, जेठे सयन असाढ़े खेल  सावन हर्रे, भादो तीत, कुवार मास गुड़ खाओ नीत  कातिक मुरई, अगहन तेल, पूस कर दूध से मेल  माघ मास घिव खिंच्चड़ खा, फागुन में उठि प्रात नहा ये बारे के सेवन करे, रोग दोस सब तन से डरे।
यह संभवतया भोजपुरी कहावत है। इसका अर्थ अभी पूरा मालूम नहीं है। फिर भी आंचलिक स्‍वर होने के कारण गिरिजेश भोजपुरिया की फेसबुक वॉल से उठाकर यहां लाया हूं।

नंगा और नहाना

एक कहावत : नंगा नहायेगा क्या और निचोडेगा क्या ?
यानि जो व्यक्ति नंगा हो वो अगर नहाने बैठेगा तो क्या कपड़ा उतारेगा और क्या कपड़ा धोएगा और क्या कपड़ा निचोडेगा। मतलब " मरे हुए आदमी को मार कर कुछ नही मिलता" ।
होली की शुभ कामनाये सभी को।
माधवी

एक कहावत

न नौ मन तेल होगा , न राधा नाचेगी ।
ये कहावत की बात पुरी तरह से याद नही आ रही है, पर हल्का- हल्का धुंधला सा याद है कि ऐसी कोई शर्त राधा के नाचने के लिए रख्खी गई थी जिसे राधा पुरी नही कर सकती थी नौ मन तेल जोगड़ने के संदर्भ में । राधा की माली हालत शायद ठीक नही थी, ऐसा कुछ था। मूल बात यह थी कि राधा के सामने ऐसी शर्त रख्खइ गई थी जो उसके सामर्थ्य से बाहर की बात थी जिसे वो पूरा नही करपाती। न वो शर्त पूरा कर पाती ,न वो नाच पाती।
अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम ,
दास मलूका कह गए सब के दाता राम ..
तात्पर्य -  अजगर किसी की नौकरी नहीं करता और पक्षी भी कोई काम नहीं करते भगवान सबका पालन हार है इसलिए कोई काम मात करो भगवान स्वयं ही देगा आलसी लोगों के लिए मलूक दास जी की ये पंक्तियाँ रामबाण है !

खंगार की जाति

"भोंर मछों और खंगार की जात सोतन  बधियो आधी रात " भावार्थ ;- शहद की बड़ी मधुमक्खी और खंगार जाति के  व्यक्ति बड़े ही खतरनाक होते हैं इसलिए उनका बध आधी रात के समय जब वे सोये हुए हो तब करना चाहिए ! इस कहावत में खंगार वीरों से शत्रुओं में ब्याप्त भय का बोध होता है ........