Friday, April 3, 2009

हम करे तो पाप, कृष्ण करें तो लीला

हम करे तो पाप, कृष्ण करें तो लीला

अर्थात् सामर्थवान के उद्दंड हरकतों को भी ज़माना हल्के से लेता हैं जबकि वही हरकत कमजोर के लिए पाप सामान होती हैं। इसके लिए कृष्ण के उदाहरण से उत्तम क्या हो सकता हैं। कृष्ण ने माखन चोरी से लेकर गोपी से छेड़-छाड तक क्या नहीं किया पर हम सब कुछ लीला मान कर पूजते हैं यदि वह सब ब्रज में किसी और ने किया होता तो उसके कारनामे हम यूँ पूजते? कहते भी हैं "समरथ को नहीं कोई दोष गोसाई..."

4 विचार आए:

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

यह कहावत है या आपके मन की बात: :)


हूं इसे तो मैं फैक्‍ट भी कह सकता हूं।

कुश said...

जब श्री कृष्ण ने ये सब किया था तब उनकी आयु क्या थी ?? क्या बड़े होने पर भी वे ये सब करते रहे थे?

राज भाटिय़ा said...

कृष्ण ने जो किया उसे हमारे पोंगा पंडितो ने गलत रुप मे एक प्लेवाय के रुप मे दर्शाया है, लेकिन हक्कीकत कुछ ओर है... राधा... भगती मै पागल थी जेसे मीरा...केसे केसे चित्र बनाये है कृष्ण के ....
धन्यवाद

Sudhir (सुधीर) said...

सिद्धार्थ जी यह लोकोक्ति तो मैं शैशव काल से सुनता आ रहा हूँ...हाँ इसकी व्याख्या मेरे मन के विचारों से अवश्य प्रभावित हैं। व्यक्तिगत रूप से मैं राज भाटिया जी से सहमत हूँ। श्री कृष्ण का रूपान्करण कई भ्रांतियों से प्रभावित रहा और कालांतर में विभिन्न कवियों ने अपने अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार व्याखित किया हैं.... फिर भी इस लोकोक्ति में कृष्ण का रूप सामर्थ्यवान व्यक्ति के रूप में ज्यादा हैं।

 

मेरे अंचल की कहावतें © 2010

Blogger Templates by Splashy Templates