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समय धराये तीन नाम, परशु, परसुआ और परशुराम

समय धराये तीन नाम,
परशु, परसुआ और परशुराम


अर्थात अच्छे बुरे समय के अनुसार, समाज का दृष्टिकोण एक ही व्यक्ति के लिए बदलता रहता हैं। इसके लिए ऋषि परशुराम का उदाहरण का प्रयोग किया गया हैं। जहाँ बचपन में प्रेम में बालक को परशु नाम से जाना जाता हैं वहीं वक्त बदलने के साथ दारिद्र के कारण उन्हें परसुआ नाम से बुलाया गया। कालांतर में जब उन्होंने विश्व विजय का अभियान शुरू किया तो लोग उन्हें आदर से परशुराम के नाम से बुलाने लगे।

Comments

रईसी तेरे तीन नाम- परसी,परसा,परसराम( रईसी के साथ बढ़ते गए) कंगाली तेरे तीन नाम नंगा,लुच्चा, बेईमान,( सारी बुराइयाँ ग़रीब में ही होती हैं रईसों की बुराइयाँ भी अच्छाई और शौक होते हैं) ऐसा बचपन में गाँव में सुन था।
Abhishek said…
Vastav mein samay ke sath bahut kuch badalta jata hai.
वाह, प्रेमलता जी की कहावत अच्छी लगी.

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चैत चना, वैशाख बेल - एक भोजपुरी कहावत

चइते चना, बइसाखे बेल, जेठे सयन असाढ़े खेल  सावन हर्रे, भादो तीत, कुवार मास गुड़ खाओ नीत  कातिक मुरई, अगहन तेल, पूस कर दूध से मेल  माघ मास घिव खिंच्चड़ खा, फागुन में उठि प्रात नहा ये बारे के सेवन करे, रोग दोस सब तन से डरे।
यह संभवतया भोजपुरी कहावत है। इसका अर्थ अभी पूरा मालूम नहीं है। फिर भी आंचलिक स्‍वर होने के कारण गिरिजेश भोजपुरिया की फेसबुक वॉल से उठाकर यहां लाया हूं।

नंगा और नहाना

एक कहावत : नंगा नहायेगा क्या और निचोडेगा क्या ?
यानि जो व्यक्ति नंगा हो वो अगर नहाने बैठेगा तो क्या कपड़ा उतारेगा और क्या कपड़ा धोएगा और क्या कपड़ा निचोडेगा। मतलब " मरे हुए आदमी को मार कर कुछ नही मिलता" ।
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माधवी

एक कहावत

न नौ मन तेल होगा , न राधा नाचेगी ।
ये कहावत की बात पुरी तरह से याद नही आ रही है, पर हल्का- हल्का धुंधला सा याद है कि ऐसी कोई शर्त राधा के नाचने के लिए रख्खी गई थी जिसे राधा पुरी नही कर सकती थी नौ मन तेल जोगड़ने के संदर्भ में । राधा की माली हालत शायद ठीक नही थी, ऐसा कुछ था। मूल बात यह थी कि राधा के सामने ऐसी शर्त रख्खइ गई थी जो उसके सामर्थ्य से बाहर की बात थी जिसे वो पूरा नही करपाती। न वो शर्त पूरा कर पाती ,न वो नाच पाती।
अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम ,
दास मलूका कह गए सब के दाता राम ..
तात्पर्य -  अजगर किसी की नौकरी नहीं करता और पक्षी भी कोई काम नहीं करते भगवान सबका पालन हार है इसलिए कोई काम मात करो भगवान स्वयं ही देगा आलसी लोगों के लिए मलूक दास जी की ये पंक्तियाँ रामबाण है !

खंगार की जाति

"भोंर मछों और खंगार की जात सोतन  बधियो आधी रात " भावार्थ ;- शहद की बड़ी मधुमक्खी और खंगार जाति के  व्यक्ति बड़े ही खतरनाक होते हैं इसलिए उनका बध आधी रात के समय जब वे सोये हुए हो तब करना चाहिए ! इस कहावत में खंगार वीरों से शत्रुओं में ब्याप्त भय का बोध होता है ........