Wednesday, May 27, 2009

एक सार्वभौमिक पहेली

हिन्दयुग्म से साभार
धरा से उगती उष्मा , तड़पती देहों के मेले
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो
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यहाँ उपभोग से ज़्यादा प्रदर्शन पे यकीं क्यों है
तटों को मिटा देने का तुम्हारा आचरण क्यों है
तड़पती मीन- तड़पन को अपना कल समझ लो
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो
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मुझे तुम माँ भी कहते निपूती भी बनाते हो
मेरे पुत्रों की ह्त्या कर वहां बिल्डिंग उगाते हो
मुझे माँ मत कहो या फिर वनों को उनका हक दो
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो
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मुझे तुमसे कोई शिकवा नहीं न कोई अदावत है
तुम्हारे आचरण में पल रही ये जो बगावत है
मेघ तुमसे हैं रूठे , बात इतनी सी समझ लो
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो

3 विचार आए:

Udan Tashtari said...

काश!! लोग सबक लें.

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

कुछ लोग सबक ले चुके हैं और सच में जमीनी तौर पर काम हो रहा है। मसलन राजस्‍थान पत्रिका का अमृतम जलम अभियान। पूरे प्रदेश में वाटर बॉडीज को सुधारा जा रहा है। गांवों में तलाईयों और बावडि़यों में पानी भरा नजर आने लगा है। बीकानेर में इस ओर काफी काम हुआ है।

Suman said...

nice

 

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