Wednesday, December 23, 2009

मूंछ उखाड़े मुर्दा हल्को न होवे

मूंछ उखाड़े मुर्दा हल्को होवे

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इस कहावत का अर्थ इस रूप में लगाया जा सकता है कि छोटे-छोटे काम निपटाने से किसी बड़े काम में सफलता नहीं मिलती। बड़े काम को करने में इस तरह के छोटे-छोटे प्रयासों से मदद भी नहीं मिलती। इस तरह के छोटे काम निरर्थक ही कहे जा सकते हैं।

3 विचार आए:

राज भाटिय़ा said...

अरे एक दो ग्राम तो वजन कम हो ही जायेगा, लेकिन अगर मुर्दा जिन्दा हो गया तो? :)

Udan Tashtari said...

सही है!

imnindian said...

NOT BAD..........
रविंद्रनाथ टगोर की एक कविता है कि लूनी नदी अगर मरू भूमि में ख़भी जाये गी तो कम से कम उस की नमी तो उस जगह में रह जाये गी ....दुनिया में कुछ भी बेकार नहीं है....

 

मेरे अंचल की कहावतें © 2010

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