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गाडी देख पग भारी

"गाडी देख,पग भारी"

कोई भी सुविधा (जो पहले नहीं थी,तब भी काम चल रहा था) जब उपलब्ध होने की सम्भावना होती है तो ऎसा महसूस होने लगता है कि उसके बिना हमारा काम चल ही नहीं सकता। जैसे पैदल चलने वाले को गाडी में बैठने का अवसर मिलते ही उसे अपने पैर पैदल चलने में भारी भारी से महसूस होने लगते हैं।

Comments

शर्मा जी..बिल्कुल मौलिक सोच और विचार वाला ब्लोग है आपका..मैं पहले भी पढता रहा हूं..कहावतों से परिचय करवाने का धन्यवाद...ये भविष्य के लिये धरोहर का काम करेंगी...
जब सुविधा मिलती है तो आलस तो आता ही है . बिलकुल सही विचार है आपका .
berojgar said…
achha hai.choti lok kahaniyan bhi likhen.
Udan Tashtari said…
सत्य वचन!!
हमारे यहां राजस्‍थान में कहते हैं गाडी देखर लाडी रो पग भारी। यानि लाडी ऐसे नाटक करने लगती है जैसे उसके पेट में बच्‍चा हो और वह एक कदम भी आगे बढ़ा नहीं पा रही है।

वैसे भावार्थ यही रहता है।

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