Sunday, September 6, 2009

गाडी देख पग भारी

"गाडी देख,पग भारी"

कोई भी सुविधा (जो पहले नहीं थी,तब भी काम चल रहा था) जब उपलब्ध होने की सम्भावना होती है तो ऎसा महसूस होने लगता है कि उसके बिना हमारा काम चल ही नहीं सकता। जैसे पैदल चलने वाले को गाडी में बैठने का अवसर मिलते ही उसे अपने पैर पैदल चलने में भारी भारी से महसूस होने लगते हैं।

5 विचार आए:

अजय कुमार झा said...

शर्मा जी..बिल्कुल मौलिक सोच और विचार वाला ब्लोग है आपका..मैं पहले भी पढता रहा हूं..कहावतों से परिचय करवाने का धन्यवाद...ये भविष्य के लिये धरोहर का काम करेंगी...

समयचक्र said...

जब सुविधा मिलती है तो आलस तो आता ही है . बिलकुल सही विचार है आपका .

berojgar said...

achha hai.choti lok kahaniyan bhi likhen.

Udan Tashtari said...

सत्य वचन!!

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

हमारे यहां राजस्‍थान में कहते हैं गाडी देखर लाडी रो पग भारी। यानि लाडी ऐसे नाटक करने लगती है जैसे उसके पेट में बच्‍चा हो और वह एक कदम भी आगे बढ़ा नहीं पा रही है।

वैसे भावार्थ यही रहता है।

 

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