संसार में उसी व्यक्ति को पूर्ण रूप से सुखी कहा जा सकता है, जो कि शरीर से निरोगी हो. ओर निरोगी रहने के लिए यह आवश्यक है कि बच्चों को उनकी बाल्यावस्था ही से स्वस्थ रखने का ध्यान रखा जाए, उनको संयमी बनाया जाए, उनको ऎसी शिक्षा दी जाए, जिससे कि वे स्वस्थ रहने की ओर अपना विशेष ध्यान दे सकें. माना कि समय की तेज रफ्तार के आगे आज शहरी और ग्रामीण समाज का अन्तर धीरे धीरे मिटता जा रहा है, लेकिन इतने पर भी आपको अभी भी गाँवों में बसते उस समाज की झाँकी देखने को मिल सकती है, जो कि युग परम्परा से श्रवण-ज्ञान द्वारा अपने स्वास्थय का ख्याल रखता आया है. यह ज्ञान बहुत कुछ उन्हे अपनी लोक-कहावतों में मिल जाता है. आप देख सकते हैं कि लोक-कहावतों के ज्ञान के कारण ही आज भी अधिकाँश ग्रामीण समाज शहरी समाज की अपेक्षा कहीं अधिक स्वस्थ एवं निरोग मिलेगा. लोक-कहावतों में प्रात:काल से लेकर रात्रि तक की विविध अनुभूतियाँ मिला करती हैं. कोई भी उनके अनुसार आचरण करके देख ले, उनकी सत्यता की गहरी छाप ह्रदय पर पडकर ही रहेगी. उदाहरणार्थ यहाँ कुछ कहावतें दी जा रही हैं----- प्रात:काल खटिया से उठकै, पियै तुरन्तै...
याद है नानी-दादी की कहावतें