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Showing posts with the label बुन्देली कहावतें

तीन बुलाये तेरह आये......

तीन बुलाये , तेरह आये , दे दाल में पानी । -------------------------------- इसका सीधा सा अर्थ ये है कि कम की व्यवस्था होने पर अधिक खर्च करना पढ़ जाए तो उसी में कुछ जोड़-तोड़ कर लेना चाहिए। हो सकता है कि किसी समय में इसका अर्थ मितव्ययता से लगाया जाता हो?

मूंछ उखाड़े मुर्दा हल्को न होवे

मूंछ उखाड़े मुर्दा हल्को न होवे । =============== इस कहावत का अर्थ इस रूप में लगाया जा सकता है कि छोटे-छोटे काम निपटाने से किसी बड़े काम में सफलता नहीं मिलती। बड़े काम को करने में इस तरह के छोटे-छोटे प्रयासों से मदद भी नहीं मिलती। इस तरह के छोटे काम निरर्थक ही कहे जा सकते हैं।

घर में नईंयाँ दाने, अम्मा चली भुनाने

घर में नईंयाँ दाने, अम्मा चली भुनाने। --------------------- नईंयाँ - नहीं हैं --------------------- यह कहावत ऐसे लोगों पर सटीक सिद्ध बैठती है जो स्वयं में कुछ न होने के बाद भी अपने आप में बहुत कुछ होने का दम भरते हैं। इसे दूसरे रूप में ऐसे भी देखा जा सकता है कि व्यक्ति कैसे झूठी शान दिखाता घूमता है।

ओछे की प्रीत, बालू की भीत

ओछे की प्रीत , बालू की भीत । ----------------- ओछे - गिरा हुआ भीत - दीवार ------------------ भावार्थ - इसका अर्थ इस रूप में लगाया जा सकता है कि जैसे बालू की दीवार मजबूत नहीं होती , कभी भी गिर सकती है उसी तरह किसी भी रूप से गिरे हुए व्यक्ति की दोस्ती भी अधिक दिनों तक नहीं चलती है । व्यक्ति चरित्र , जुबान , विश्वास आदि किसी से भी गिरा हुआ हो सकता है ।

सो वो कानईं मे मूत्हे

लला को सिर पै बैठाहो, सो वो कानईं में मूतहै। ------------- कानईं - कान में बैठाहो - बैठाओगे मूतहै - पेशाब करना लला - लड़कों को देशज भाषा में बुलाने का शब्द ------------------ भावार्थ - इसे कहावत के स्थान पर लोकोक्ति कहना ज्यादा उचित है। यह बुन्देलखण्ड में बहुत ही ज्यादा प्रचलन में है। इसका अर्थ यह लगाया जाता है कि किसी भी व्यक्ति या बच्चे को अधिक लाड-प्यार दीजिए तो वह बिगड़ैल होकर परेशान करने वालीं हरकतें करने लगता है।

कौआ कोसे ढोर न मरे

कौआ के कोसे ढोर मरे तो, रोज कोसे, रोज मारे, रोज खाए। ---------------------------------- कोस - किसी के बारे में बुरा सोचना, किसी का बुरा होने की कामना करना। ढोर - जानवर ----------------------------- भावार्थ - इसका सीधा सा अर्थ है कि यदि बुरा सोचने वालों के कारण ही किसी का बुरा होने लगे तो सभी बैठे-बैठे लोगों का बुरा करते रहेंगे। यदि ऐसा होता तो कौआ को अपने खाने के लिए किसी मरे जानवर का इंतज़ार नहीं करना पढता। वह रोज किसी जानवर का बुरा सोचता (मरने की सोचता) जानवर मरते और कौआ को खाने को मिलता। इससे शिक्षा मिलती है कि हमारा बुरा हमेशा हमारे कर्मों से होता है, किसी के बुरा चाहने से हमारा बुरा नहीं होता।

जैसे उदई, तैसेई भान

जैसे उदई, तैसेई भान, न उनके चुटिया, न उनके कान। ---------------------- भावार्थ - इसका अर्थ इस रूप में लगाया जाता है जब किसी भी काम को करने के लिए एक जैसे स्वभाव के लोग मिल जायें और काम उनके कारण बिगड़ जाये। कहा जा सकता है कि बेवकूफों को काम सौंपने से ही इस कहावत का जन्म हुआ होगा।

जुलाहे से लठ्ठमलट्ठा

सूत न कपास, जुलाहे से लठ्ठमलट्ठा -------------------- इसका भावार्थ है किसी ऐसी चीज के लिए लड़ने लगना जिसका कोई अस्तित्व ही न हो। हमारे बाबा-दादी इसको लेकर एक छोटी सी कहानी सुनाते थे कि एक बार दो पड़ोसियों में आपस में बात हो रही थी। एक खेत खरीदने जा रहा था और दूसरा भैंस खरीदने। पहले पड़ोसी ने कहा कि तुम अपनी भैंस बाँध कर रखना कहीं हमारे खेत में घुस कर फसल न खा जाये। दूसरे पड़ोसी को यह बुरा लगा उसने कहा कि तुम अपने खेत में बाड़ लगाना क्योंकि भैंस तो मूक जानवर है। उसे बार-बार कैसे रोका जा सकेगा? बस इसी बात पर दोनों में कहासुनी बहुत बढ़ गई। देखते-देखते दोनों में लाठी-डंडों से लड़ाई भी शुरू हो गई। सम्भवतः इसी को देखकर यह कहावत बनी होगी।

चोरन गारीं दें

चीज न राखैं आपनी, चोरन गारी दैं। -------------- भावार्थ - इसका अर्थ सीधा सा है कि कुछ लोग हैं जो अपने सामान की रक्षा तो करते नहीं हैं बाद में चोरी हो जाने पर चोरों को गाली देते फिरते हैं। कहने का तात्पर्य है कि हमेशा स्वयं ही अपने सामान या फिर अपने अधिकारों के लिए सचेत रहना चाहिए।

ख़ुद करे तो खेती

खुद करै तो खेती, नईं तौ बंजर हैती। ------------------------------- भावार्थ - इसका अर्थ यह है कि हमें अपने काम स्वयं करने चाहिए। किसी के भरोसे पर काम छोड़ने से उसमें हानि ही होती है। इसी कारण से इस कहावत में खेती का उदाहरण दिया गया है।

मन मन भावै, मुड़ी हलावै

मन मन भावै, मुड़ी हलावै। मुडी - सिर भावार्थ - इसका अर्थ है कि मन ही मन में तो किसी बात के प्रति हाँ रहती है पर बाहर से उसे मना करने का दिखावा किया जाता है।

रत्ती रती साधे

रत्ती रत्ती साधै तौ द्वारै हाती होयै। रत्ती रत्ती खोबै तो द्वारै बैठके रोये।। भावार्थ - इसका अर्थ है कि यदि थोड़ा-थोड़ा करके जोड़ा जाये तो धन-सम्पदा प्राप्त होती है। इसे ही सांकेतिक रूप में हाथी बांधने से समझाया गया है। इसी तरह यदि थोड़ा-थोड़ा ही गंवाया जाता रहे तो रोने की नौबत आ जाती है। अर्थात हमेशा सोच-समझ कर ही खर्च करना चाहिए।

चलनियऊ बोले, जामें बहत्तर छेद

सूप तो सूप, चलनियऊ बोले, जामें बहत्तर छेद। इसका तात्पर्य ऐसे लोगों से है जो ख़ुद में कुछ भी नहीं होते पर दूसरों के सामने ख़ुद को साबित करने में लगे रहते हैं। इसका एक अर्थ ये भी है किअपने दोषों को देखे बिना दूसरों के दोष बताने की कोशिश करते रहते हैं।

कुंजरिया अपने बेर खट्टे न बताये

कुंजरिया अपने बेर खट्टे न बताये। कुंजरिया=सब्जी बेचने वाली भावार्थ- इसका अर्थ है किकोई भी अपनी वस्तु, अपनी चीज की बुराई नहीं करता है। ये ठीक उसी तरह है जैसे कि सब्जी बेचने वाली अपने बेरों को कभी भी खट्टा नहीं बताती है।

खसम को रोटी तुम पै देओ

बातें-चीतें हमसे लेओ, खसम को रोटी तुम पै देओ। =============================== खसम = पति पै = बनाना बातें-चीतें = बातचीत, गपशप =================================== बुंदेलखंड में ये कहावत ऐसे लोगों के लिए प्रयुक्त होती है जो काम की अपेक्षा बातों में अपना अधिक समय लगाते हैं.

घर कुलिया में

शान बड़ी, घर कुलिया में। ============== कुलिया = छोटी सी गली ============== ये कहावत का एक छोटा सा हिस्सा है। इसका अर्थ है कि शान या दिखावा तो बहुत किया जाता है पर असलियत में कुछ भी नहीं होता है। ये कहावत ऐसे लोगों के लिए बनी है जो अकारण अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने में लगे रहते हैं।

अंड को मूसरो

अक्सर देखा जाता है कि किसी काम के लिए कुछ विशेष या निश्चित लोगों की जरूरत होती है और कुछ बिना कारण बीच में हस्तक्षेप किया करते हैं ऐसे लोगों को किसी तरह का कोई लाभ भी नहीं मिलता है और सामाजिक स्थिति भी ख़राब हो जाती है. ऐसे ही लोगों को ध्यान में रख कर ये कहावत बनी होगी- राजा को दूसरो, अंड को मूसरो और बकरिया को तीसरो, परेशान होते है। ====================== अंड = एक लकडी जो एकदम खोखली होती है। मूसरो = मूसल, जिससे कुटाई की जाती है। बकरिया = बकरी ======================= इसका अर्थ है कि यदि राजा के दो लड़के हैं तो दूसरे को लाभ नहीं होता है क्योंकि राज्य परम्परा के अनुसार बड़े को मिलता है यानी पहले को. इसी तरह अंड की लकडी इतनी खोखली होती है कि यदि उसका मूसल बना लिया जाए तो भी उससे किसी तरह की कुटाई नहीं की जा सकती है. कुछ इसी तरह का हाल बकरी के तीसरे बच्चे का होता है. चूँकि बकरी के दो थन होते हैं और यदि उसके एक साथ तीन बच्चे हो जाते हैं तो तीसरे को हमेशा थन से दूध पीने में दिक्कत आती रहती है.

मारें लातई-लात

ग्यानी तें ग्यानी मिलें, करें ज्ञान की बात। गधा से गधा मिलें, मारें लातई-लात। ============================================ कहावत है की जब ज्ञानी व्यक्ति(बुद्धिमान) किसी दूसरे ज्ञानी व्यक्ति से मिलता है तो वे आपस में ज्ञान की बातें, भली बातें करते हैं और जब दो मूरख आपस में मिलते हैं तो उनमें विवाद होने के और कुछ नहीं होता है.

हाथ में खुरपी, बगल में चारा

ससुरार सुख की सार, जो रहे दिना दो-चार। जो रहे दिना दस-बारा, हाथ में खुरपी, बगल में चारा। ======================================== ससुरार = ससुराल दिना = दिन बारा = बारह ========================================== इस कहावत का तात्पर्य है कि जिस जगह आपकी इज्ज़त बहुत अधिक होती हो (उदहारण के लिए ससुराल) वहां एक समय सीमा से अधिक नहीं रुकना चाहिए. इससे इज्ज़त कम होती है और फ़िर उसे भी रोज़मर्रा के काम करने पड़ सकते हैं.

सरगे को जाए

दादा मीठे, ददिया मीठी, सरगे को जाए? =========================================== सरगे = स्वर्ग इस कहावत का अर्थ इस रूप में है कि काम भी हो जाए और प्रयास भी न करना पड़े. उदहारण के लिए यदि किसी को अपनी सेहत बनानी हो और वो सुबह जल्दी जाग कर कसरत करना या घूमना भी नहीं चाह रहा तो यही कहा जाएगा.