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मूंछ उखाड़े मुर्दा हल्को न होवे

मूंछ उखाड़े मुर्दा हल्को होवे

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इस कहावत का अर्थ इस रूप में लगाया जा सकता है कि छोटे-छोटे काम निपटाने से किसी बड़े काम में सफलता नहीं मिलती। बड़े काम को करने में इस तरह के छोटे-छोटे प्रयासों से मदद भी नहीं मिलती। इस तरह के छोटे काम निरर्थक ही कहे जा सकते हैं।

Comments

अरे एक दो ग्राम तो वजन कम हो ही जायेगा, लेकिन अगर मुर्दा जिन्दा हो गया तो? :)
imnindian said…
NOT BAD..........
रविंद्रनाथ टगोर की एक कविता है कि लूनी नदी अगर मरू भूमि में ख़भी जाये गी तो कम से कम उस की नमी तो उस जगह में रह जाये गी ....दुनिया में कुछ भी बेकार नहीं है....
amit said…
Aakhir Kyonमूंछ उखाड़े मुर्दा हल्को न होवे
Pauranik Kathayenthank for artical