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मूंछ उखाड़े मुर्दा हल्को न होवे

मूंछ उखाड़े मुर्दा हल्को न होवे । =============== इस कहावत का अर्थ इस रूप में लगाया जा सकता है कि छोटे-छोटे काम निपटाने से किसी बड़े काम में सफलता नहीं मिलती। बड़े काम को करने में इस तरह के छोटे-छोटे प्रयासों से मदद भी नहीं मिलती। इस तरह के छोटे काम निरर्थक ही कहे जा सकते हैं।

घर में नईंयाँ दाने, अम्मा चली भुनाने

घर में नईंयाँ दाने, अम्मा चली भुनाने। --------------------- नईंयाँ - नहीं हैं --------------------- यह कहावत ऐसे लोगों पर सटीक सिद्ध बैठती है जो स्वयं में कुछ न होने के बाद भी अपने आप में बहुत कुछ होने का दम भरते हैं। इसे दूसरे रूप में ऐसे भी देखा जा सकता है कि व्यक्ति कैसे झूठी शान दिखाता घूमता है।
छाया बखत की चाहे कैर ही हो, चलना रास्ते का चाहे फेर ही हो, बैठना भाइयों में चाहे बैर ही हो

ओछे की प्रीत, बालू की भीत

ओछे की प्रीत , बालू की भीत । ----------------- ओछे - गिरा हुआ भीत - दीवार ------------------ भावार्थ - इसका अर्थ इस रूप में लगाया जा सकता है कि जैसे बालू की दीवार मजबूत नहीं होती , कभी भी गिर सकती है उसी तरह किसी भी रूप से गिरे हुए व्यक्ति की दोस्ती भी अधिक दिनों तक नहीं चलती है । व्यक्ति चरित्र , जुबान , विश्वास आदि किसी से भी गिरा हुआ हो सकता है ।

काठ की हंडी बार बार नहीं चढ़ती .

काठ की हंडी बार बार नहीं चढ़ती . इसका मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को बार - बार मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है सिर्फ एक बार बनाया जा सकता है . जैसे काठ की हांडी चुलेह पर सिर्फ एक बार चढ़ती है बार - बार नहीं वैसे ही किसी को एक बार मूर्ख बनाया जा सकता है. .

सो वो कानईं मे मूत्हे

लला को सिर पै बैठाहो, सो वो कानईं में मूतहै। ------------- कानईं - कान में बैठाहो - बैठाओगे मूतहै - पेशाब करना लला - लड़कों को देशज भाषा में बुलाने का शब्द ------------------ भावार्थ - इसे कहावत के स्थान पर लोकोक्ति कहना ज्यादा उचित है। यह बुन्देलखण्ड में बहुत ही ज्यादा प्रचलन में है। इसका अर्थ यह लगाया जाता है कि किसी भी व्यक्ति या बच्चे को अधिक लाड-प्यार दीजिए तो वह बिगड़ैल होकर परेशान करने वालीं हरकतें करने लगता है।

एक कहावत

नौ सो चूहे खा कर बिल्ली हज को चली यानि सौ गुनाह कर के कोई जब मंदिर जाता है अपना पाप धोने तब यह कहावत याद आती है...