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तीन बुलाये तेरह आये......

तीन बुलाये , तेरह आये , दे दाल में पानी । -------------------------------- इसका सीधा सा अर्थ ये है कि कम की व्यवस्था होने पर अधिक खर्च करना पढ़ जाए तो उसी में कुछ जोड़-तोड़ कर लेना चाहिए। हो सकता है कि किसी समय में इसका अर्थ मितव्ययता से लगाया जाता हो?

दमडी की बुलबुल टका हलाल.........

बहुत दिन हुए इस ब्लाग पर कुछ लिख नहीं पाया। आज अचानक से एक पुरानी कहावत याद आ गई तो सोचा कि क्यों न इसे आप लोगों को भी अवगत कराया जाए।   जहाँ देखहूं निज अधिक बिगार, लघु लाभहु कर तजहुँ विचार  नहिं यह बुद्धिमान की चाल, "दमडी की बुलबुल टका हलाल" ।। अब कहावत आप लोगों नें पढ ली है तो लगे हाथ इसका अर्थ भी बता ही दीजिए। भई ऎसा मत सोचिएगा कि मैं कोई पहेली पूछ रहा हूँ या कि मैने आप लोगों के ज्ञान की कोई परीक्षा लेने का मन बनाया है। ऎसा कुछ नहीं है---वो तो बस वैसे ही ज्यादा कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा था तो सोचा कि जितना लिख दिया, उसे ही पोस्ट कर देते हैं। बाकी सब समझदार लोग हैं---खुद ही समझ लेंगें :-) अरे हाँ, एक ओर कहावत याद आ गई, वो भी पढते चलिए:---- जो कछु लखि न परे निज हानि, तौ समाज को तजहु न कानि क्यों बिन स्वारथ सहिये खिल्ली, "पंच कहैं बिल्ली तौ बिल्ली"
चूल्हे में हगें शनिचर खां खोर दें ! तात्पर्य - अपना दोष दूसरे पर डालना .
अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम , दास मलूका कह गए सब के दाता राम .. तात्पर्य -  अजगर किसी की नौकरी नहीं करता और पक्षी भी कोई काम नहीं करते भगवान सबका पालन हार है इसलिए कोई काम मात करो भगवान स्वयं ही देगा आलसी लोगों के लिए मलूक दास जी की ये पंक्तियाँ रामबाण है !
ऊधौ का देना ना माधौ का लेना ! तात्पर्य - किसी का कर्ज ना होना ! सम्बन्ध- नौ नगद ना तेरह  उधार !
पाल पाल तोरे जी खां काल ! तात्पर्य - सांप कभी भी आश्रय दाता को मार सकता है इसलिए उसे नहीं पालना चाहिए ! 
काग घोंसला मारिये , मसि भींजत परिहार ! जाट जरुरी मारिये , घुट्नन चलत खंगार ! ! तात्पर्य - काग (कौआ) परिहार, जाट और खंगार ये चार चतुर चालक शत्रु होते हैं अगर इनसे बैर है तो कौए को घोसले में ही , परिहार को मूंछ निकलने से पहले , जाट को जब भी मौका मिले और खंगार को जब वह बच्चा हो तब ही मार देना चाहिए  बर्ना देर हो जाएगी !