कौआ के कोसे ढोर मरे तो, रोज कोसे, रोज मारे, रोज खाए। ---------------------------------- कोस - किसी के बारे में बुरा सोचना, किसी का बुरा होने की कामना करना। ढोर - जानवर ----------------------------- भावार्थ - इसका सीधा सा अर्थ है कि यदि बुरा सोचने वालों के कारण ही किसी का बुरा होने लगे तो सभी बैठे-बैठे लोगों का बुरा करते रहेंगे। यदि ऐसा होता तो कौआ को अपने खाने के लिए किसी मरे जानवर का इंतज़ार नहीं करना पढता। वह रोज किसी जानवर का बुरा सोचता (मरने की सोचता) जानवर मरते और कौआ को खाने को मिलता। इससे शिक्षा मिलती है कि हमारा बुरा हमेशा हमारे कर्मों से होता है, किसी के बुरा चाहने से हमारा बुरा नहीं होता।