Skip to main content

Posts

काठ की हंडी बार बार नहीं चढ़ती .

काठ की हंडी बार बार नहीं चढ़ती . इसका मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को बार - बार मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है सिर्फ एक बार बनाया जा सकता है . जैसे काठ की हांडी चुलेह पर सिर्फ एक बार चढ़ती है बार - बार नहीं वैसे ही किसी को एक बार मूर्ख बनाया जा सकता है. .

सो वो कानईं मे मूत्हे

लला को सिर पै बैठाहो, सो वो कानईं में मूतहै। ------------- कानईं - कान में बैठाहो - बैठाओगे मूतहै - पेशाब करना लला - लड़कों को देशज भाषा में बुलाने का शब्द ------------------ भावार्थ - इसे कहावत के स्थान पर लोकोक्ति कहना ज्यादा उचित है। यह बुन्देलखण्ड में बहुत ही ज्यादा प्रचलन में है। इसका अर्थ यह लगाया जाता है कि किसी भी व्यक्ति या बच्चे को अधिक लाड-प्यार दीजिए तो वह बिगड़ैल होकर परेशान करने वालीं हरकतें करने लगता है।

एक कहावत

नौ सो चूहे खा कर बिल्ली हज को चली यानि सौ गुनाह कर के कोई जब मंदिर जाता है अपना पाप धोने तब यह कहावत याद आती है...

एक कहावत पुरानी

पूत कपूत तो का धन संचय , पूत सपूत तो का धन संचय इस कहावत के पीछे का मर्म यह है कि पूत अगर कपूत निकला तो उसके लिए धन संचय करके क्या फायदा , क्यों कि कपूत तो कमाया हुआ धन नष्ट कर देगा. और अगर वो सपूत निकला तो भी धन संचय कर के क्या फायदा , क्योकि सपूत खुद धन संचय कर सकता है. दोनों ही हालातो में मनुष्य को संग्रह कि नीति से बचना का सुझाव दिया गया है.

एक कहावत

बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद यानि गलत पात्र से (बन्दर से ) किसी सही चीज (अदरक ) का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए . जैसे किसी डाक्टर से किसी कानून की बरीकियो के बारे में राय लेना .

एक कहावत

दान के बछ्छिया के दांत नहीं गिने जाते यानि जो चीज मुफ्त में मिल रही है उसमे मीन मेख नहीं निकला जाता है. जैसा मिलरहा है वैसा स्वीकार किया जाता है.

कौआ कोसे ढोर न मरे

कौआ के कोसे ढोर मरे तो, रोज कोसे, रोज मारे, रोज खाए। ---------------------------------- कोस - किसी के बारे में बुरा सोचना, किसी का बुरा होने की कामना करना। ढोर - जानवर ----------------------------- भावार्थ - इसका सीधा सा अर्थ है कि यदि बुरा सोचने वालों के कारण ही किसी का बुरा होने लगे तो सभी बैठे-बैठे लोगों का बुरा करते रहेंगे। यदि ऐसा होता तो कौआ को अपने खाने के लिए किसी मरे जानवर का इंतज़ार नहीं करना पढता। वह रोज किसी जानवर का बुरा सोचता (मरने की सोचता) जानवर मरते और कौआ को खाने को मिलता। इससे शिक्षा मिलती है कि हमारा बुरा हमेशा हमारे कर्मों से होता है, किसी के बुरा चाहने से हमारा बुरा नहीं होता।